एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
छत्तीसगढ़ में सुशासन के खोखले दावों के बीच राजनांदगांव के स्वास्थ्य महकमे ने वह कारनामा कर दिखाया है, जिसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को शर्मसार कर दिया है। छुरिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों और गर्भवती महिलाओं के 7,28,610 रुपये भोजन बिल वित्तीय अनियमितता के मामले आखिरकार वही हुआ, जिसकी आशंका थी। तीन सदस्यीय जांच दल ने ‘क्लीन चिट’ की वह स्क्रिप्ट लिख दी है, जो सीधे-सीधे भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का खुला प्रदर्शन है। जांच दल ने शिकायत को ‘निराधार’ बताते हुए बिलिंग प्रक्रिया को जायज ठहरा दिया है, लेकिन इस तथाकथित रिपोर्ट ने खुद विभाग के गले में कानूनी फंदा डाल दिया है।
20 दिनों तक क्यों ‘गर्भाशय’ में थी जांच रिपोर्ट?
इस तथाकथित ‘फेयर इन्वेस्टिगेशन’ की टाइमलाइन ही इसकी बदनीयती को बयां करने के लिए काफी है। यह विवादित जांच रिपोर्ट 25 जून 2026 को ही बनकर तैयार हो चुकी थी, लेकिन इसे पूरे 20 दिनों तक दबाकर रखा गया, शिकायतकर्ता के बार बार मांग करने पर 15 जुलाई 2026 को सार्वजनिक किया गया। सवाल यह उठता है कि अगर सब कुछ पाक-साफ था, तो 20 दिनों तक इस फाइल को छुपाकर किस ‘शुभ मुहूर्त’ का इंतजार किया जा रहा था? साफ है कि इन 20 दिनों में उच्च स्तर पर सेटिंग-गेटिंग का खेल खेला गया और रिपोर्ट की भाषा को इस तरह सुधारा गया ताकि लेखापाल को हर हाल में बचाया जा सके।
छत्तीसगढ़ प्रशासनिक नियमावली का सरेआम कत्ल
छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम और विभागीय जांच की तय प्रशासनिक नियमावली के तहत, किसी भी जांच को ‘न्याय संगत’ तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक शिकायतकर्ता का पक्ष न सुना जाए।
शिकायतकर्ता का बयान गायब: जांच दल ने शिकायतकर्ता के लिखित बयान दर्ज किए बिना ही अपनी मर्जी से निष्कर्ष निकाल दिया। नियमावली के अनुसार, मुख्य शिकायतकर्ता के बयान का सत्यापन अनिवार्य है। नियम विरुद्ध तरीके से और जांच को लंबा घुमाने के लिए शिकायतकर्ता को लगभग 50 किलोमीटर दूर छुरिया बुलाया गया।
जबकि शिकायत मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, राजनांदगांव कार्यालय में की गई थी और बिल भी इसी कार्यालय से पास हुआ था। जब शिकायतकर्ता ने इस पर सवाल उठाया तो जांच दल ने बिना शिकायतकर्ता के बयान के रिपोर्ट बना दी। बिना बयान के बनाई गई यह रिपोर्ट पूरी तरह ‘अवैध’ और ‘शून्य’ है।
बैक-डेट बिलिंग पर रहस्यमयी चुप्पी: शिकायत का मुख्य आधार यह था कि बिना उच्च अधिकारियों की अनुमति के, पिछले वित्तीय वर्ष के बिलों को चोरी-छिपे बैक-डेट में कैसे पास किया गया? छत्तीसगढ़ वित्तीय संहिता के अनुसार, लैप्स हो चुके बजट या पुराने बिलों को पास करने के लिए सक्षम प्राधिकारी की वित्तीय स्वीकृति अनिवार्य है। मगर, इस ‘मैनेज्ड’ जांच रिपोर्ट में इस मुख्य बिंदु का जिक्र तक न करना यह साबित करता है कि जांच दल खुद इस सिंडिकेट का हिस्सा बन चुका है।
यह जांच नहीं, ‘भ्रष्टाचार का बीमा’ है
ऐसी असंतोषजनक, एकतरफा और न्याय के सिद्धांतों के विपरीत बनी रिपोर्ट को जनता सिरे से खारिज करती है। यह जांच रिपोर्ट नहीं, बल्कि लेखापाल को सुरक्षित रिटायरमेंट दिलाने का ‘विभागीय बीमा’ है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और जांच अधिकारी ही मुल्जिमों के वकील बन जाएं, तो ऐसे तंत्र से न्याय की उम्मीद करना बेमानी है। स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी और जांच दल के तीनों सदस्य को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे कानून से ऊपर नहीं हैं। प्रशासनिक नियमों को ताक पर रखकर तैयार की गई इस ‘क्लीन चिट’ के खिलाफ अब उच्च अधिकारियों को शिकायत की जाएगी।
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