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*तीन लाख महीना और विपक्ष की चुप्पी?*

*कवर्धा में आक्रामक… लेकिन पंडरिया आते ही सन्नाटा क्यों?*

क्या जिला कांग्रेस अध्यक्ष का दायरा सिर्फ कवर्धा विधानसभा तक सीमित है, या फिर कबीरधाम की राजनीति में कुछ ऐसे समीकरण बन चुके हैं जिन पर खुलकर चर्चा नहीं होती?

कवर्धा। कबीरधाम जिले की राजनीति हमेशा से प्रदेश की सबसे दिलचस्प और अप्रत्याशित राजनीति रही है। यहां समीकरण रातों-रात बदलते हैं, मित्र विरोधी बन जाते हैं और विरोधी मित्र। लेकिन पिछले ढाई वर्षों से जो तस्वीर दिखाई दे रही है, वह कई सवाल खड़े करती है।

कवर्धा विधानसभा की बात हो तो जिला कांग्रेस कमेटी का नेतृत्व भाजपा सरकार, प्रशासन और स्थानीय मुद्दों पर लगातार मुखर दिखाई देता है। प्रेस वार्ता, ज्ञापन, धरना और बयान—सब कुछ देखने को मिलता है।

लेकिन जैसे ही बात पंडरिया विधानसभा की आती है, अचानक सब कुछ शांत हो जाता है। वही जिला नेतृत्व, जो कवर्धा में हर मुद्दे पर आक्रामक नजर आता है, पंडरिया के अनेक मुद्दों पर लगभग मौन दिखाई देता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—आखिर ऐसा क्यों?

पिछले ढाई वर्षों में पंडरिया क्षेत्र से जुड़े कई ऐसे मुद्दे सामने आए जिन पर विपक्ष की मजबूत भूमिका अपेक्षित थी। स्थानीय स्तर पर कार्यकर्ताओं ने कई बार विरोध दर्ज कराया, लेकिन जिला स्तर पर वैसी सक्रियता नहीं दिखी जैसी अन्य क्षेत्रों में देखने को मिलती है।

यहीं से राजनीतिक गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं शुरू होती हैं।

कुछ समय से यह चर्चा सुनाई देती रही है कि विपक्ष की नरमी के पीछे राजनीतिक समझ या अन्य कारण हो सकते हैं। यहां तक कि प्रतिमाह आर्थिक लेन-देन जैसी बातें भी जनचर्चा का हिस्सा बनती रही हैं। इन दावों का कोई सार्वजनिक या स्वतंत्र प्रमाण उपलब्ध नहीं है, इसलिए इन्हें तथ्य नहीं कहा जा सकता। लेकिन जब लगातार चुप्पी दिखाई देती है और बड़े मुद्दों पर प्रभावी विरोध नजर नहीं आता, तो ऐसे सवाल और चर्चाएं स्वाभाविक रूप से जन्म लेती हैं।

यदि ये चर्चाएं पूरी तरह निराधार हैं, तो जिला नेतृत्व को स्वयं सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। लोकतंत्र में पारदर्शिता ही अफवाहों का सबसे प्रभावी जवाब होती है।

सवाल किसी व्यक्ति का नहीं, बल्कि विपक्ष की भूमिका और उसकी विश्वसनीयता का है। यदि विपक्ष क्षेत्र विशेष के मुद्दों पर अलग-अलग रवैया अपनाता हुआ दिखाई देता है, तो जनता और कार्यकर्ताओं के मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

राजनीति में रणनीति आवश्यक है, लेकिन रणनीति और चुप्पी के बीच की दूरी बहुत कम होती है। जब कार्यकर्ता ही यह महसूस करने लगें कि कुछ मुद्दों पर संगठन सक्रिय नहीं है, तो यह चिंता का विषय बन जाता है।

नोट: इस लेख में आर्थिक लेन-देन संबंधी उल्लेख केवल जनचर्चाओं और राजनीतिक चर्चाओं के संदर्भ में किया गया है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है। किसी व्यक्ति या संस्था के विरुद्ध आरोप सिद्ध मानने का आशय नहीं है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसे सभी प्रश्नों का उत्तर तथ्यों और पारदर्शिता के आधार पर दिया जाना चाहिए।

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