एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
छुरिया सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में मरीजों के निवाले पर डाका डालने वाले वित्तीय घोटाले में एक नया और बड़ा मोड़ आया है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय राजनांदगांव द्वारा जारी एक आधिकारिक पत्र (क्रमांक/शिकायत शाखा/2026/2030, दिनांक 15.05.2026) सामने आया है। इस पत्र ने यह तो साबित कर दिया है कि भ्रष्टाचार हुआ है, लेकिन इसके साथ ही विभाग की वही पुरानी ‘जांच नीति’ भी सामने आ गई है, जो अक्सर बड़े घोटालों को दफन करने के काम आती है।
CMHO के पत्र में क्या है?
शिकायत पर संज्ञान लेते हुए CMHO राजनांदगांव ने तीन सदस्यीय जांच टीम का गठन किया है। इस टीम में शामिल हैं। पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि वित्तीय वर्ष 2023-24 के 7,28,610 रुपये के भोजन और जननी शिशु सुरक्षा योजना के बिलों का भुगतान वित्तीय वर्ष 2024-25 में बिना कलेक्टर या संचालक की अनुमति के करने का प्रयास किया गया। CMHO ने इस तीन सदस्यीय टीम को जांच कर ‘जांच प्रतिवेदन अभिमत सहित’ प्रस्तुत करने का आदेश दिया है।
क्यों उठ रहे हैं सवाल? सिर्फ खानापूर्ति या कार्रवाई?
पत्र जारी होने के बाद लोगों में आक्रोश कम होने के बजाय बढ़ गया है। इतिहास गवाह है कि स्वास्थ्य विभाग में जब भी कोई बड़ा घोटाला उजागर होता है, अधिकारी तुरंत एक ‘जांच कमेटी’ का गठन कर देते हैं। यह कमेटी असल में आरोप से घिरे कर्मचारी को बचाने और जनता के गुस्से को शांत करने का एक सुरक्षित रास्ता बन चुकी है।
सवाल 1: जब शिकायत में साफ है कि बिना सक्षम अधिकारी की पूर्व अनुमति के नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं, तो लेखापाल को तत्काल निलंबित क्यों नहीं किया गया?
सवाल 2: जांच टीम में शामिल अधिकारी क्या सच में निष्पक्ष जांच करेंगे, या अपने ही विभाग के कर्मचारियों को बचाने के लिए लीपापोती की जाएगी?
‘सुशासन तिहार’ के मुंह पर तमाचा है यह सुस्ती
एक तरफ सरकार प्रदेश में ‘सुशासन तिहार’ मनाकर जीरो टॉलरेंस का ढोल पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ राजनांदगांव का स्वास्थ्य विभाग गंभीर वित्तीय अनियमितता के सीधे प्रमाण मिलने के बाद भी केवल कागजी औपचारिकताएं पूरी कर रहा है। भ्रष्ट तत्वों के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें न तो नियमों का डर है और न ही प्रशासन का।
अगर हर बार की तरह इस मामले को भी ‘जांच लंबित है’ का बहाना बनाकर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, तो यह साफ हो जाएगा कि सुशासन के सारे दावे सिर्फ राजनीतिक नारेबाजी हैं।
कमेटी नहीं, तत्काल कार्रवाई हो
इस बार केवल ‘कमेटी के प्रतिवेदन’ का इंतजार कर हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठा नहीं जाएगा। मांग बेहद स्पष्ट है: मामले में संलिप्त लेखापाल को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाए। जांच की एक निश्चित समय-सीमा तय हो, न कि इसे महीनों तक घसीटा जाए। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक कर संबंधित कर्मचारी के खिलाफ FIR दर्ज की जाए।
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