एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
जिला चिकित्सालय राजनंदगांव इस समय घोर प्रशासनिक लापरवाही और आपसी खींचतान का अखाड़ा बन चुका है। अस्पताल प्रबंधन की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है। हाल ही में जारी हुए ताबड़तोड़ आदेशों और उनके बाद पैदा हुए अंदरूनी विद्रोह ने यह साफ कर दिया है कि अस्पताल के भीतर भारी अराजकता का माहौल है। जिम्मेदार अधिकारी व्यवस्था सुधारने के लिए कागजी घोड़े दौड़ा रहे हैं, लेकिन कर्मचारी उनके आदेशों को ठेंगा दिखाकर पुरानी कुर्सियों पर कुंडली मारकर बैठे हैं।
कागजी आदेशों की खुली अवहेलना, कुर्सियों से चिपके कर्मचारी
अस्पताल प्रबंधन ने व्यवस्था को पारदर्शी, प्रभावी और चुस्त-दुरुस्त बनाने के उद्देश्य से एक साथ 13 कर्मचारियों के प्रभार बदलने का कड़ा फरमान जारी किया था। प्रशासनिक कसावट के नाम पर जारी इस सूची में शामिल कर्मचारियों ने प्रबंधन के आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ा दी हैं। इनमें से किसी भी कर्मचारी ने अपनी नई टेबल पर कदम तक नहीं रखा और अपनी पुरानी मलाईदार सीटों पर मजबूती से जमे हुए हैं। कोई भी कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी बदलने को तैयार नहीं है। इस खुली बगावत ने अस्पताल प्रशासन के प्रशासनिक कसावट को पूरी तरह खत्म कर दिया है। जब निचले स्तर के कर्मचारी ही शीर्ष अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर रहे हैं, तो अस्पताल की व्यवस्था का सुचारू रूप से चलना नामुमकिन हो गया है।
टेंडर में गड़बड़ी रोकने के लिए फेरबदल, लेकिन कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं पुराने कर्मचारी
इस प्रशासनिक गतिरोध के बीच, अस्पताल के भीतर वित्तीय पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए प्रबंधन ने एक और महत्वपूर्ण संशोधित आदेश जारी किया है। जिला अस्पताल में जेम पोर्टल के माध्यम से होने वाली लाखों रुपये की सरकारी खरीद-फरोख्त में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी, हेरफेर या वित्तीय अनियमितता न हो, इसे सुनिश्चित करने के लिए प्रबंधन ने कड़ा रुख अपनाया है।
अस्पताल प्रशासन ने पुराने ढर्रे को बदलते हुए गैर-कार्यालयीन फर्नीचर, महंगे चिकित्सकीय उपकरणों, दवाओं और अन्य आवश्यक सामग्रियों की खरीदी सहित तमाम संवेदनशील निविदाओं (टेंडरों) का पूरा प्रभार तत्काल प्रभाव से एक नए जिम्मेदार कर्मचारी को सौंप दिया है। इस फेरबदल का मुख्य उद्देश्य टेंडर प्रक्रियाओं को पूरी तरह साफ-सुथरा, पारदर्शी और नियमों के तहत संचालित करना है।
लेकिन प्रबंधन की इस सुधारवादी कोशिश पर पानी फेरने के लिए मलाईदार पद पर बैठा पुराना कर्मचारी अड़ गया है। वह सरकारी आदेश को ताक पर रखकर टेंडर प्रक्रिया वाला यह महत्वपूर्ण पद छोड़ने को कतई तैयार नहीं है। हद तो तब हो गई जब अपनी कुर्सी बचाने के लिए इस कर्मचारी ने राजनीतिक पैंतरेबाज़ी शुरू कर दी है। वह अपनी सीट पर बने रहने के लिए इधर-उधर के रसूखदार नेताओं से सीधे अस्पताल प्रबंधन और बड़े अधिकारियों को फोन लगवाकर दबाव बनवा रहा है। प्रशासनिक आदेश पर राजनीतिक संरक्षण का यह मामला अस्पताल के गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है।
किसी भी कर्मचारी के खिलाफ नहीं की गई कार्रवाई
एक तरफ जहां अस्पताल प्रशासन टेंडरों और सरकारी खरीदी में गड़बड़ी रोकने के लिए कड़े कदम उठा रहा है, वहीं दूसरी तरफ निचले स्तर के कर्मचारियों के अड़ियल रवैये और राजनीतिक दखलंदाजी ने पूरी सुधार प्रक्रिया को वेंटिलेटर पर ला दिया है। प्रशासनिक व्यवस्था और नेताओं के फोन कॉल्स के इस दिखावे की लड़ाई के बीच जिला अस्पताल के दैनिक कार्य प्रभावित हो रहे हैं। इतने बड़े पैमाने पर आदेशों की अवहेलना और राजनीतिक दबाव के बाद भी अब तक किसी भी बागी कर्मचारी के खिलाफ कोई कड़ी अनुशासनात्मक या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है, जो प्रबंधन की ढुलमुल कार्यप्रणाली को उजागर करता है।
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