✍🏻 लाला कर्णकान्त श्रीवास्तव
एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता और ढुलमुल रवैये का एक ऐसा शर्मनाक चेहरा सामने आया है, जिसे सुनकर किसी भी आम नागरिक का गुस्सा फूट पड़ेगा। जिला अस्पताल प्रबंधन की नाक के नीचे साल 2022 से पूरे 42 लाख रुपए सरकारी खाते में धूल खा रहे हैं, लेकिन मजाल है कि किसी जिम्मेदार अधिकारी की नींद टूटी हो! अधिकारियों की इस कुंभकर्णी नींद और लापरवाही की कीमत इलाके के गरीब और बेबस मरीज अपनी जेब ढीली करके चुका रहे हैं।
फाइलों में दफन हुई मरीजों की आस
हैरानी की बात यह है कि इस भारी-भरकम राशि की भनक तक किसी को नहीं लगने दी गई। एक तरफ अस्पताल प्रबंधन ब्लड कंपोनेंट मशीन लगवाने के लिए सिर्फ कागजी अर्जियां और औपचारिकताएं पूरी करने का ढोंग रचता रहा। दूसरी तरफ, जब इस अति-आवश्यक मशीन को लगाने में कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई, तो नियमों का हवाला देकर इस फंड को दूसरे कार्यों में समायोजित (एडजस्ट) करने की तैयारी कर ली गई। यह सीधे तौर पर जनता के पैसों का दुरुपयोग और मरीजों के स्वास्थ्य के साथ किया गया भद्दा खिलवाड़ है।
निजी सेंटरों की चांदी, गरीबों की जेब पर डाका
अस्पताल के इस गैरजिम्मेदाराना रवैये का सबसे दर्दनाक असर उन मरीजों पर पड़ रहा है जो जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं। जिला अस्पताल में ब्लड कंपोनेंट सेपरेटर मशीन न होने के कारण मरीजों को रेड ब्लड सेल्स, प्लेटलेट्स, प्लाज्मा, व्हाइट ब्लड सेल्स, क्रायोप्रेसिपिटेट और फ्रेश फ्रोजन प्लाज्मा जैसे जरूरी कंपोनेंट्स के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है।
डेंगू, एनीमिया और एक्सीडेंट के गंभीर मामलों में जब मरीजों को तुरंत प्लेटलेट्स या FFP की जरूरत होती है, तो सरकारी अस्पताल उन्हें बेसहारा छोड़ देता है। मजबूरन तीमारदारों को शहर के महंगे निजी सेंटरों और प्राइवेट लैब्स का रुख करना पड़ता है। जहां एक-एक यूनिट के लिए निजी संचालक मनमाने दाम वसूलते हैं। जो सरकारी अस्पताल में मुफ्त या न्यूनतम दर पर मिलनी चाहिए थी, उसके लिए गरीब जनता को अपनी जेबें खाली करनी पड़ रही हैं।
समायोजन के नाम पर लीपापोती का खेल
सवाल यह उठता है कि जब साल 2022 से बजट उपलब्ध था, तो 4 साल बीत जाने के बाद भी मशीन क्यों नहीं खरीदी गई? क्या अस्पताल प्रबंधन किसी खास सप्लायर के ‘कमीशन’ का इंतजार कर रहा था? या फिर यह मान लिया जाए कि अफसरों को जनता की जान से ज्यादा दिलचस्पी कागजी खानापूर्ति और बजट को इधर-उधर ठिकाने लगाने में है? ब्लड कंपोनेंट मशीन जैसी जीवन रक्षक सुविधा के पैसे को किसी दूसरे काम में समायोजित करने का विचार ही अपने आप में एक बड़ा प्रशासनिक अपराध है।
तीखे सवाल:
42 लाख रुपए की इस मोटी रकम को दबाकर बैठने वाले असली गुनहगार कौन हैं?
इतने सालों तक इस गंभीर लापरवाही पर स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों ने आंखें क्यों मूंदे रखीं?
निजी लैब्स को फायदा पहुंचाने के लिए क्या यह जानबूझकर रची गई साजिश है?
इस पूरे मामले ने सरकारी स्वास्थ्य दावों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। अब देखना यह है कि इस तीखे खुलासे के बाद शासन-प्रशासन के जिम्मेदार कुर्सियों से हिलते हैं या फिर हमेशा की तरह मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।
इस मामले को लेकर सिविल सर्जन डॉ. महेन्द्र प्रसाद ने बताया कि ब्लड कम्पोनेंट के लिए काफी पहले बजट आ चुका था, लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। अब फाइल हमारे पास आ चुकी है, मशीन लगाने के लिए तैयारी की जा रही है।
*******


