एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
राजनांदगांव आबकारी विभाग में चल रहे ‘ऑडियो कांड’ में एक ऐसा मोड़ आया है जिसे देखकर कानून और व्यवस्था पर से आम जनता का भरोसा उठ जाएगा। विभाग के सहायक आयुक्त द्वारा जारी पत्र ने यह साबित कर दिया है कि जब अपनों को बचाने की बात आती है, तो सरकारी कुर्सियों पर बैठे जिम्मेदार अधिकारी किस हद तक जा सकते हैं। इस पत्र ने विभाग की जांच की निष्पक्षता का जनाजा निकाल दिया है।
कुबूलनामा भी और पल्ला झाड़ने का खेल भी!
अधिकारी ने अपने पत्र में लिखित रूप से स्वीकार किया है कि “उक्त ऑडियो को मेरे द्वारा सुने जाने पर प्रथम दृष्ट्या मुख्य लिपिक राम सिंह पाटिल की आवाज प्रतीत होती है।” अब सवाल यह उठता है कि जब खुद विभाग के मुखिया को पहली नजर में यह यकीन हो गया है कि अवैध शराब की डीलिंग और कमीशनखोरी की बात करने वाला शख्स उनका अपना बाबू ही है, तो तत्काल निलंबन क्यों नहीं किया गया? एफआईआर दर्ज कराने के बजाय अधिकारी पत्र लिखकर शिकायतकर्ता को ही ज्ञान बांट रहे हैं।
अजीब बहाना: ‘हमारे पास तकनीकी प्रशिक्षण नहीं है’
भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का इससे घटिया और मजाकिया बहाना इतिहास में शायद ही कहीं मिले। सहायक आयुक्त पत्र में लिखते हैं कि उन्हें सोशल मीडिया (ऑडियो-वीडियो) की जांच के लिए ‘किसी भी प्रकार का तकनीकी प्रशिक्षण प्राप्त नहीं है।’
वाह साहब वाह! जब विभाग में कोई आपराधिक गड़बड़ी पकड़ी जाती है, तो क्या उसकी फॉरेंसिक और तकनीकी जांच कराना विभाग की जिम्मेदारी है या शिकायतकर्ता की? जनता जानना चाहती है कि:
क्या करोड़ों का राजस्व वसूलने वाले विभाग के पास इतनी भी ताकत नहीं है कि वह इस ऑडियो को सरकारी साइबर सेल या फॉरेंसिक लैब में जांच के लिए भेज सके?
क्या जांच के नाम पर सिर्फ समय काटने और मामले को ठंडे बस्ते में डालने की यह सुनियोजित साजिश नहीं है?
शिकायतकर्ता को ही थमा दी जिम्मेदारी!
पत्र के अंत में विभाग ने अपनी नाकामी की हद पार करते हुए लिखा है कि “अतः उक्त शिकायत से आप संतुष्ट नहीं होने पर तकनीकी शाखा से जांच करा लेवें।” एक सजग नागरिक का काम भ्रष्टाचार को उजागर करना और सुबूत देना है, जो उन्होंने पूरी जिम्मेदारी से किया। अब क्या फॉरेंसिक लैब की दौड़ लगाना और जांच अधिकारी की भूमिका निभाना भी जनता का काम है? तो फिर हजारों रुपए की सैलरी लेने वाले ये अफसर दफ्तरों में क्या सिर्फ मलाई खाने के लिए बैठे हैं?
सीधे सवाल जो जरूरी है
कलेक्टर महोदय, क्या आबकारी विभाग का यह जवाब आपके प्रशासन की छवि को धूमिल नहीं कर रहा? क्या ऐसे लापरवाह अधिकारियों पर एक्शन होगा?
बाबू को अब तक विभागीय संरक्षण क्यों दिया जा रहा है? क्या इस चुप्पी की कीमत ऊपर तक पहुंच चुकी है?
भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का ‘सरकारी सर्टिफिकेट’
यह पत्र जांच रिपोर्ट नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का ‘सरकारी सर्टिफिकेट’ है। प्रथम दृष्ट्या दोष सिद्ध होने के बाद भी तकनीकी अक्षमता का रोना रोकर बच निकलना आबकारी विभाग के नकारेपन को दर्शाता है। यदि शासन-प्रशासन ने इस ‘कांड’ पर कड़ा संज्ञान नहीं लिया, तो यह साफ हो जाएगा कि राजनांदगांव में कानून का राज नहीं, बल्कि भ्रष्ट अधिकारियों और शराब माफियाओं का कॉकटेल राज चल रहा है!
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