एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ का दम भरने वाले प्रशासनिक तंत्र की कलई खुल चुकी है। राजनांदगांव जिला अस्पताल में हुए लाखों रुपए के फर्नीचर खरीदी वित्तीय अनियमितता पर महीनों से जारी “जांच का नाटक” अब जनता के सब्र का इम्तिहान ले रहा है। कई महीने बीत जाने के बाद भी नतीजा सिफर है। कार्रवाई के नाम पर प्रशासन की सुस्ती और लगातार बदलती तारीखों ने यह साफ कर दिया है कि यह जांच सच को सामने लाने के लिए नहीं, बल्कि उस पर धूल डालने के लिए की जा रही है। जिला कोषालय और जिला अस्पताल प्रबंधन की यह रहस्यमयी खामोशी अब चीख-चीखकर गवाही दे रही है कि भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं और इसके पीछे किसी ‘बड़े रसूखदार’ का कृपा दृष्टि है।
महीनों का इंतजार, फाइलें खा रही हैं धूल
एक सीधा सा सवाल राजनांदगांव की जनता पूछ रही है—आखिर एक अस्पताल के फर्नीचर खरीद के बिलों और सामान की गुणवत्ता जांचने में कितने युग लगेंगे? महीनों से जिला प्रशासन केवल “जांच चल रही है” का रटा-रटाया राग अलाप रहा है। यह प्रशासनिक कछुआ चाल कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। सिस्टम का यह पुराना आजमाया हुआ नुस्खा है: जांच को इतना लंबा खींच दो कि मुद्दा ही अपनी मौत मर जाए। आम जनता इस धोखे को समझ चुकी है कि इस ‘फुटबॉल मैच’ में गोल पोस्ट केवल दोषियों को बचाने के लिए खिसकाया जा रहा है।
लीपापोती का खेल हुआ पुख्ता, सुलगते सवाल!
कार्रवाई न होना अब सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि खुली मिलीभगत की ओर इशारा करता है। कई महीनों के इस लंबे कालखंड में क्या सबूतों को छिन्न-भिन्न नहीं किया गया होगा? क्या गवाहों और दस्तावेजों को मैनिपुलेट करने का खुला मौका नहीं दिया गया? जब राज्य में मेडिकल खरीद घोटाले पर कड़ा शिकंजा कसा जा रहा है, तो राजनांदगांव के इस स्थानीय कांड को ठंडे बस्ते में क्यों डाल दिया गया?
जनता के जेहन में ये तीखे सवाल प्रशासन को कटघरे में खड़ा करते हैं:
जांच या बचाव अभियान? महीनों से चल रही इस जांच में आखिर ऐसी क्या ‘दिव्य रिसर्च’ हो रही है कि रिपोर्ट की एक लाइन भी सार्वजनिक नहीं की जा सकी?
कौन है वो ‘महाबली’? जिला अस्पताल प्रबंधन के उन जिम्मेदार चेहरों पर अब तक निलंबन या एफआईआर की गाज क्यों नहीं गिरी, जिनके दस्तखतों से यह पूरा खेल रचा गया?
प्रशासन की चुप्पी का राज क्या है? क्या जिला प्रशासन का शीर्ष नेतृत्व इस मामले की गंभीरता को समझने में जानबूझकर नाकाम साबित हो रहा है?
जनता के पैसे पर डाका और कुर्सियों का आनंद ले रहे अधिकारी
एक तरफ जिला अस्पताल में मूलभूत सुविधाओं के अभाव में गरीब मरीज और उनके परिजन बेहाल हैं। दूसरी तरफ, जनता की गाढ़ी कमाई को डकारने वाले सफेदपोश अधिकारी वातानुकूलित कमरों में बैठकर कुर्सियों का आनंद ले रहे हैं। जांच के नाम पर महीनों से चली आ रही यह लीपापोती अब इस बात की तस्दीक करती है कि दोषियों का रसूख कानून से भी बड़ा हो चुका है।
राजनांदगांव की सजग जनता अब इस प्रशासनिक तमाशे को मूकदर्शक बनकर नहीं देखेगी। साहब! जवाब तो देना ही होगा।
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