एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
भ्रष्टाचार की दीमक जब सरकारी सिस्टम को चाटने लगती है, तो न्याय की उम्मीद करना बेमानी हो जाता है। राजनांदगांव जिला अस्पताल में लाखों रुपए के फर्नीचर खरीद में हुए कथित घोटाले का मामला अब इसी प्रशासनिक संवेदनहीनता की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। दो महीने का लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन मजाल है कि जांच रिपोर्ट का एक पन्ना भी आगे बढ़ा हो। ऐसा लगता है कि जिला कोषालय और जिला अस्पताल प्रबंधन ने मिलकर जांच की फाइल को ‘फुटबॉल’ बना दिया है, जिसे एक विभाग से दूसरे विभाग की पाले में धकेला जा रहा है, ताकि वक्त बीतने के साथ जनता की याददाश्त धुंधली हो जाए और असली गुनहगार चैन की नींद सो सकें।
जांच के नाम पर केवल ‘डेट-पर-डेट’
घोटाले की गूंज जब गलियारों में सुनाई दी थी, तब आनन-फानन में बड़ी-बड़ी बातें की गई थीं। सख्त कार्रवाई और निष्पक्ष जांच के दावे किए गए थे। लेकिन हकीकत यह है कि 60 दिन बाद भी नतीजा ‘शून्य’ है। सूत्रों की मानें तो जिला कोषालय और अस्पताल प्रबंधन के बीच समन्वय की कमी नहीं, बल्कि जानबूझकर बनाई गई ‘दूरी’ है। यह दूरी इसलिए बनाई गई है ताकि जांच की रिपोर्ट कभी तैयार ही न हो सके। आखिर कौन है जो इन फाइलों को दबाकर बैठा है? किसकी शह पर जनता के टैक्स के पैसे पर डकैती डालने वालों को संरक्षण दिया जा रहा है?
लीपापोती की आशंका: क्या रसूखदारों को बचाने का खेल है?
दो महीने में एक छोटी सी फर्नीचर खरीद की जांच पूरी न होना सीधे तौर पर ‘लीपापोती’ की ओर इशारा करता है। आशंका गहरी है कि घोटाले के तार कुछ ऐसे रसूखदारों से जुड़े हैं, जिन पर हाथ डालते ही कई बड़े चेहरों से नकाब उतर सकता है। यही कारण है कि जांच टीम कछुए की रफ्तार से भी धीमी चल रही है। अस्पताल प्रबंधन और कोषालय की इस ‘जुगलबंदी’ ने यह साबित कर दिया है कि उनके लिए जनता का स्वास्थ्य और सरकारी पैसा नहीं, बल्कि घोटालेबाजों की सुरक्षा सर्वोपरि है।
सफेदपोशों की चुप्पी और प्रशासन का मौन
अस्पताल में टूटे बेड और घटिया फर्नीचर के बीच मरीज सिसक रहे हैं, लेकिन साहबों के दफ्तरों में नई कुर्सियों की चमक फीकी न पड़े, इसके लिए जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। जिला प्रशासन का यह मौन और जांच अधिकारियों की टालमटोल वाली नीति इस बात की तस्दीक करती है कि इस ‘खेल’ में खिलाड़ी बहुत बड़े हैं।
जनता पूछ रही है सवाल:
आखिर दो महीने में रिपोर्ट क्यों नहीं बनी?
क्या कोषालय और अस्पताल प्रबंधन की मिलीभगत से सबूतों को नष्ट किया जा रहा है?
क्या जिला प्रशासन इस घोटाले के असली ‘मास्टरमाइंड’ का नाम उजागर करने से डर रहा है?
यदि जल्द ही जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि शासन-प्रशासन भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ का केवल ढोंग कर रहा है। यह घोटाला सिर्फ फर्नीचर का नहीं, बल्कि आम आदमी के भरोसे का भी है।
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