एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
प्रदेश के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय एक ओर ‘सुशासन’ और ‘भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन’ का दावा कर रहे हैं, वहीं राजनांदगांव जिले में प्रशासनिक अराजकता और अधिकारियों की तानाशाही अपने चरम पर है। स्थिति यह है कि जिला प्रशासन पर कलेक्टर का नियंत्रण पूरी तरह समाप्त होता नजर आ रहा है। अधीनस्थ विभागों के अधिकारी अपनी मर्जी के मालिक बन बैठे हैं और आम जनता की शिकायतों को कूड़ेदान के हवाले किया जा रहा है।
न्यायालय के निर्देशों की धज्जियां, ‘जांच’ बनी फाइलों को दबाने का जरिया
माननीय सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय ने कई फैसलों में स्पष्ट किया है कि शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है। लेकिन राजनांदगांव में इसके उलट ‘फर्जी रिपोर्ट’ का खेल चल रहा है। भ्रष्टाचार की शिकायतों पर जांच के नाम पर महीनों फाइलें दबाई जाती हैं और अंत में अधिकारियों के रसूख का इस्तेमाल कर ‘सब कुछ ठीक है’ वाली फर्जी क्लीन चिट देकर प्रकरण को नस्तीबद्ध (फाइल क्लोज) कर दिया जाता है। यह सीधे तौर पर भारतीय दंड संहिता की धारा 166 और 167 का उल्लंघन है, जिसमें लोक सेवकों द्वारा गलत दस्तावेज तैयार करना दंडनीय अपराध है।
RTI बना मजाक: सूचना के अधिकार की गलाघोंटू राजनीति
छत्तीसगढ़ शासन की स्पष्ट गाइडलाइन है कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत जानकारी उपलब्ध कराना अनिवार्य है, अन्यथा संबंधित अधिकारी पर अनुशासनात्मक कार्रवाई होगी। परंतु राजनांदगांव जिले में सूचना का अधिकार महज एक मजाक बनकर रह गया है। अधिकारी जानकारी देने के बजाय आवेदकों को डराने-धमकाने और भ्रामक जानकारी देकर टालने का काम कर रहे हैं। यह राज्य सूचना आयोग के उन निर्देशों की खुली अवहेलना है, जिसमें पारदर्शिता को प्रशासन की प्राथमिकता बताया गया है।
भ्रष्टाचार का बोलबाला और अधिकारियों की निरंकुशता
जिले के विभिन्न विभागों में बिना ‘सुविधा शुल्क’ के फाइलें आगे नहीं बढ़ रही हैं। छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, की धज्जियां उड़ाते हुए अधिकारी जनसेवक के बजाय तानाशाह की भूमिका में हैं। कलेक्टर कार्यालय में शिकायतों का अंबार लगा है, लेकिन जनदर्शन और जन-सुनवाई केवल फोटो खिंचवाने का माध्यम बनकर रह गई है। जमीनी स्तर पर पीड़ितों को न्याय के बजाय केवल तारीखें और झूठे आश्वासन मिल रहे हैं।
सरकार की साख पर बट्टा लगाता जिला प्रशासन
शासन की मंशा अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने की है, लेकिन राजनांदगांव के अधिकारी सरकार और जनता के बीच ‘बाधा’ बन चुके हैं। यदि शिकायतों पर पक्षपात पूर्ण जांच और तानाशाही रवैया अपनाने वाले अधिकारियों पर निलंबन की गाज नहीं गिरी, तो वह दिन दूर नहीं जब जनता का भरोसा लोकतंत्र और प्रशासन से पूरी तरह उठ जाएगा।
सवाल तो यह है: क्या कलेक्टर महोदय इस प्रशासनिक सड़न को देख नहीं पा रहे हैं, या फिर सब कुछ जानते हुए भी ‘मौन’ रहकर अधिकारियों की ऐसी तानाशाही को मौन सहमति दे रहे हैं?
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