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फाइल फोटो

एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव

संस्कारधानी के जिला अस्पताल (बसंतपुर) में हुआ बहुचर्चित फर्नीचर घोटाला एक बार फिर चर्चाओं में है। लाखों रुपये की लागत से खरीदे गए फर्नीचर में भारी अनियमितता और भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद शुरू हुई जांच अब प्रशासनिक फाइलों में दम तोड़ती नजर आ रही है। ताजा घटनाक्रम बताते हैं कि मामले की जांच कछुआ गति से चल रही है, जिससे यह अंदेशा गहरा गया है कि जिम्मेदार अधिकारी इस पूरे प्रकरण को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

बता दें कि जिला अस्पताल के नवीनीकरण और सुविधाओं के विस्तार के नाम पर पिछले समय में लाखों रुपये के फर्नीचर (बेड, अलमारी, कुर्सियां और अन्य उपकरण) की खरीदी की गई थी। आरोप है कि इस खरीदी में न केवल ‘भंडार क्रय नियमों’ की धज्जियां उड़ाई गईं, बल्कि घटिया दर्जे के सामान को ऊंचे दामों पर खरीदा गया। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं ने दस्तावेजों के साथ शिकायत की थी कि जो फर्नीचर अस्पताल पहुंचा, उसकी बाजार दर सरकारी बिलों से काफी कम है।

जांच में कोताही और ‘तारीख पर तारीख’
घोटाला उजागर होने के बाद शासन ने आनन-फानन में जांच कमेटी गठित की थी। नियमानुसार, जांच रिपोर्ट एक तय समय सीमा के भीतर सौंपनी थी, लेकिन महीना बीत जाने के बाद भी कमेटी किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंची है। सूत्रों का कहना है कि जांच दल के सदस्य बार-बार बयान दर्ज करने और भौतिक सत्यापन के नाम पर समय टाल रहे हैं। अस्पताल प्रबंधन के कुछ रसूखदार अधिकारी-कर्मचारी जो इस खरीदी प्रक्रिया का हिस्सा थे, अब भी अपने पदों पर जमे हुए हैं, जिससे साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ की आशंका बढ़ गई है।

अफसरों की भूमिका पर सवाल

हैरानी की बात यह है कि जिला प्रशासन के आला अधिकारी इस संवेदनशील मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं। जब भी मीडिया या आरटीआई कार्यकर्ताओं द्वारा जांच की प्रगति पूछी जाती है, तो ‘प्रक्रिया जारी है’ कहकर पल्ला झाड़ लिया जाता है। जानकारों का मानना है कि इस घोटाले के तार न केवल अस्पताल प्रबंधन बल्कि विभाग के कुछ बड़े चेहरों से भी जुड़े हो सकते हैं। यही कारण है कि मामले को रफा-दफा करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर जबरदस्त ‘लॉबिंग’ चल रही है।

जनता और मरीजों का नुकसान

एक ओर जहां सरकारी धन का दुरुपयोग कर घटिया फर्नीचर खरीदा गया, वहीं दूसरी ओर इसका खामियाजा अस्पताल आने वाले मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। कई वार्डों में नया फर्नीचर आने के कुछ महीनों भीतर ही टूटने लगा है। जनता के टैक्स के पैसे की इस तरह बर्बादी और उस पर प्रशासन की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ राजनांदगांव की राजनीति में भी उबाल ला रही है।

प्रशासनिक पारदर्शिता की परीक्षा
राजनांदगांव जिला अस्पताल का यह फर्नीचर घोटाला केवल भ्रष्टाचार का मामला नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता की भी परीक्षा है। यदि समय रहते दोषियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं हुई, तो सरकारी सिस्टम से आम आदमी का भरोसा उठ जाएगा। अब देखना होगा कि उच्च स्तर पर बैठे अधिकारी अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं या यह मामला भी अन्य घोटालों की तरह फाइलों में दफन होकर रह जाएगा।

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