एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
जिला चिकित्सालय राजनांदगांव में हुए फर्नीचर खरीदी के रिकॉर्ड ‘जलभराव’ में नष्ट होने का सनसनीखेज मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। सूचना के अधिकार के तहत हुए इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद सजग नागरिक द्वारा सिविल सर्जन को बाकायदा लिखित शिकायत सौंपकर सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की गई थी। लेकिन बेहद शर्मनाक और संदेहास्पद स्थिति यह है कि इस गंभीर शिकायत को दर्ज हुए कई दिन बीत जाने के बाद भी अस्पताल प्रबंधन गहरी नींद में सोया हुआ है। सिविल सर्जन कार्यालय द्वारा अब तक न तो मामले में संलिप्त कर्मचारियों पर कोई कार्रवाई की गई है और न ही मामले की जांच के लिए कोई कमेटी गठित की गई है। अधिकारियों का यह रहस्यमयी मौन सीधे तौर पर यह इशारा करता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी की पूरी दाल ही काली है।
कार्रवाई से क्यों डर रहा है अस्पताल प्रबंधन?
सजग नागरिक द्वारा सिविल सर्जन को सौंपे गए शिकायती पत्र में साफ तौर पर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 3 के उल्लंघन का हवाला दिया गया था। सरकारी नियमों के मुताबिक, महत्वपूर्ण क्रय और ऑडिट से जुड़े दस्तावेजों का इस तरह पानी में डूबकर नष्ट हो जाना घोर प्रशासनिक लापरवाही और कदाचरण की श्रेणी में आता है। इसके बावजूद सिविल सर्जन कार्यालय द्वारा इस मामले को ठंडे बस्ते में डाल देना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर ऐसा क्या है जिसे छुपाने के लिए प्रबंधन इतना लाचार नजर आ रहा है? क्या विभागीय जांच शुरू होने पर अस्पताल के ही कुछ बड़े रसूखदार कर्मचारियों का गठजोड़ बेनकाब हो जाएगा?
जलभराव सिर्फ एक बहाना, असली मकसद घोटाले को दफन करना!
अस्पताल के भीतर चल रही चर्चाओं की मानें तो ‘रिकॉर्डरूम में पानी भरना’ महज एक सोची-समझी पटकथा का हिस्सा है। पिछले तीन-चार सालों में जिला अस्पताल के लिए लाखों रुपये के फर्नीचर की कागजी और जमीनी खरीदी में भारी झोल होने की आशंका है। नियमतः हर साल इन शासकीय संपत्तियों का भौतिक सत्यापन होना अनिवार्य था। अब जब जनता ने आरटीआई के जरिए इसका हिसाब मांग लिया, तो चालाकी से पूरी फाइल को ही ‘जल समाधि’ दे दी गई ताकि न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। अधिकारियों की वर्तमान सुस्ती और निष्क्रियता इस संदेह को शत-प्रतिशत यकीन में बदल रही है कि यह प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि एक सुनियोजित ‘मैन-मेड’ घोटाला है।
चुप बैठे जिम्मेदार, क्या अब सीधे राज्य सूचना आयोग और कोर्ट करेगा फैसला?
इस पूरे मामले में सिविल सर्जन की चुप्पी यह साबित करने के लिए काफी है कि निचले स्तर के कर्मचारियों से लेकर शीर्ष अधिकारियों तक, सबकी जवाबदेही इस मामले में संदिग्ध है। जब एक जागरूक नागरिक लिखित में शिकायत देकर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के तहत कार्रवाई की मांग कर रहा है, तब भी फाइलों को दबाकर बैठे रहना सीधे तौर पर प्रशासनिक तानाशाही है। शिकायकर्ता ने अब साफ कर दिया है कि यदि अस्पताल प्रबंधन इसी तरह भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देता रहा, तो इस मामले की समानांतर शिकायत सीधे छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों से की जाएगी। देखना होगा कि राजनांदगांव जिला अस्पताल का यह गूंगा-बहरा सिस्टम कब जागता है, या फिर भ्रष्टाचार की इस बहती नदी में सब ऐसे ही डुबकी लगाते रहेंगे।
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