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एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
छत्तीसगढ़ का स्वास्थ्य विभाग अपनी लचर व्यवस्थाओं के लिए अक्सर सुर्खियों में रहता है, लेकिन राजनांदगांव जिला चिकित्सालय ने इस बार लापरवाही और संदेहास्पद कारनामे का एक ऐसा नया कीर्तिमान स्थापित किया है, जिसने प्रशासनिक शुचिता की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। सूचना का अधिकार के तहत मांगी गई एक जानकारी के जवाब में सिविल सर्जन कार्यालय ने जो दलील दी है, वह न सिर्फ हास्यास्पद है, बल्कि सीधे तौर पर एक बड़े भ्रष्टाचार को दबाने की सोची-समझी साजिश की ओर इशारा करती है।
RTI में मिला अनोखा जवाब: ‘फर्नीचर का रिकॉर्ड पानी में बह गया’
दरअसल, एक सजग नागरिक ने सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत जिला अस्पताल राजनांदगांव से बीते वर्षों में खरीदे गए कार्यालयीन फर्नीचर और उनके भौतिक सत्यापन की रिपोर्ट मांगी थी। आम जनता टैक्स देती है ताकि सरकारी पैसे का सही इस्तेमाल हो, लेकिन जब इस खर्च का हिसाब मांगा गया, तो अस्पताल कार्यालय ने पत्र जारी कर साफ कह दिया कि अधिकांश रिकॉर्ड भू-तल के रिकॉर्डरूम में ‘जलभराव’ के कारण नष्ट हो चुका है, इसलिए जानकारी “निरंक” है।
लापरवाही या घोटाले को दफन करने की साजिश?
इस जवाब ने एक गंभीर यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है—क्या यह वाकई प्राकृतिक जलभराव था या फिर लाखों रुपये के फर्नीचर घोटाले की फाइलों को जानबूझकर ‘जल समाधि’ दे दी गई? पिछले तीन-चार सालों में जिला अस्पताल में लाखों रुपये के फर्नीचर की खरीदी की गई। नियम के मुताबिक, हर साल इन संपत्तियों का भौतिक सत्यापन होना अनिवार्य है ताकि पता चल सके कि कागजों पर खरीदा गया सामान हकीकत में अस्पताल में मौजूद है भी या नहीं। अब जब रिकॉर्ड ही गायब कर दिया गया है, तो यह संदेह गहराना लाजिमी है कि वित्तीय अनियमितताओं और फर्जी बिलों के खेल को छुपाने के लिए पानी का बहाना बनाया गया है।
छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियमों की सरेआम धज्जियां
सरकारी दस्तावेज राज्य की बहुमूल्य संपत्ति होते हैं। इन्हें सुरक्षित रखना संबंधित अधिकारियों और रिकॉर्ड कीपर की प्राथमिक जिम्मेदारी है। छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1965 के नियम 3 के तहत हर शासकीय सेवक को पूर्ण कर्तव्यपरायणता और सत्यनिष्ठा बनाए रखनी होती है। लेकिन राजनांदगांव जिला अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारियों ने इन नियमों को रद्दी का टुकड़ा समझ लिया है। बिना किसी ठोस सुरक्षा इंतजामों के संवेदनशील ऑडिट और क्रय फाइलों को ऐसे बेसमेंट में लावारिस छोड़ देना, जहां पानी भरने का खतरा हो, घोर प्रशासनिक अकर्मण्यता और आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में आता है।
सवाल: कब होगी उच्च स्तरीय जांच?
इस पूरे मामले में केवल ‘रिकॉर्ड खराब होने’ का बहाना बनाकर अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते। शिकायतकर्ता ने अब सीधे सिविल सर्जन को एक बेहद कड़ा शिकायत पत्र सौंपकर छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के तहत दोषी कर्मचारियों पर तत्काल विभागीय जांच बैठाने की मांग की है। मामला बेहद संगीन है; अगर समय रहते इसकी उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच नहीं हुई और रिकॉर्ड नष्ट करने वालों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की गई, तो यह साफ हो जाएगा कि राजनांदगांव जिला अस्पताल में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हैं और उन्हें ऊपर से संरक्षण प्राप्त है। अब देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी इस ‘कागजी जलप्रलय’ के पीछे छिपे असली चेहरों को बेनकाब करते हैं या मामले को रफा-दफा कर देते हैं।
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