IMG-20241026-WA0010
IMG-20241026-WA0010
previous arrow
next arrow

एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव

जिला चिकित्सालय राजनंदगांव इस समय पूरी तरह प्रशासनिक अराजकता की गर्त में समा चुका है। अस्पताल प्रबंधन की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है। हाल ही में जारी हुए ताबड़तोड़ आदेशों के बाद पैदा हुए अंदरूनी विद्रोह और अब सामने आई एक सनसनीखेज लिखित शिकायत ने यह साफ कर दिया है कि अस्पताल के भीतर कुछ रसूखदार कर्मचारियों का एक ऐसा ‘सिंडिकेट’ सक्रिय है, जो न सिर्फ सरकारी आदेशों को ठेंगा दिखा रहा है, बल्कि नए और ईमानदार कर्मचारियों को मानसिक रूप से प्रताड़ित भी कर रहा है। जिम्मेदार अधिकारी व्यवस्था सुधारने के लिए कागजी घोड़े दौड़ा रहे हैं, लेकिन मलाईदार सीटों पर कुंडली मारकर बैठे पुराने कर्मचारी अपनी हुकूमत छोड़ने को कतई तैयार नहीं हैं।

टेंडर और सरकारी खरीदी में पारदर्शिता की कोशिश पर पानी फेरने की साजिश
अस्पताल के भीतर वित्तीय पारदर्शिता लाने और भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए प्रबंधन ने लाखों रुपये की सरकारी खरीद में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी, हेरफेर या वित्तीय अनियमितता को रोकने के लिए कड़ा रुख अपनाया था। गैर-कार्यालयीन फर्नीचर, महंगे चिकित्सकीय उपकरणों, दवाओं और अन्य आवश्यक सामग्रियों की खरीदी सहित तमाम संवेदनशील निविदाओं (टेंडरों) का पूरा प्रभार तत्काल प्रभाव से एक नए जिम्मेदार कर्मचारी को सौंपने का आदेश जारी किया गया था। इस फेरबदल का मुख्य उद्देश्य टेंडर प्रक्रियाओं को साफ-सुथरा और भ्रष्टाचार मुक्त बनाना था।
लेकिन प्रबंधन की इस सुधारवादी कोशिश पर पानी फेरने के लिए मलाईदार पद पर बैठा पुराना कर्मचारी अड़ गया है। वह सरकारी आदेश को ताक पर रखकर टेंडर प्रक्रिया वाला यह महत्वपूर्ण पद छोड़ने को तैयार नहीं है। हद तो तब हो गई जब अपनी कुर्सी बचाने के लिए इस कर्मचारी ने न सिर्फ राजनीतिक पैंतरेबाज़ी शुरू कर दी और रसूखदार नेताओं से फोन लगवाकर दबाव बनवाया, बल्कि अब नए प्रभार लेने वाले कर्मचारियों को सीधे केबिन में घुसकर धमकाया जा रहा है।

केबिन में घुसकर नौकरी खाने की धमकी, आरटीआई और विधानसभा प्रश्न का डर
अस्पताल के भीतर चल रही इस तानाशाही का सबसे घिनौना रूप तब सामने आया जब नए प्रभारी कर्मचारी को उसके ही कक्ष में जाकर खुलेआम डराया-धमकाया गया। शिकायत के अनुसार, पुराना कर्मचारी नए प्रभारी के कक्ष में घुसकर रौब झाड़ते हुए कहता है कि “मैने तुम्हें कोई प्रभार नहीं दिया है और न ही किसी सामग्री का प्रभार दूंगा।” इतना ही नहीं, नए कर्मचारी को मानसिक रूप से तोड़ने के लिए उसकी ‘परिवीक्षा अवधि’ का हवाला देकर नौकरी से निकलवाने की धमकी दी जा रही है।
यह सिंडिकेट नए कर्मचारियों को फंसाने के लिए सूचना के अधिकार और विधानसभा प्रश्न लगवाने जैसे हथकंडों का इस्तेमाल कर रहा है। नए कर्मचारियों को सीधे शब्दों में कहा जा रहा है कि अगर वे इस मलाईदार प्रभार में कदम रखेंगे, तो उनके खिलाफ जानबूझकर आरटीआई लगवाई जाएगी, गलतियां निकाली जाएंगी और ऐसी स्थिति पैदा कर दी जाएगी कि उनकी नौकरी चली जाए। सरकारी दफ्तर के भीतर कार्यालयीन समय में इस प्रकार की खुलेआम दादागीरी यह दर्शाती है कि इन तत्वों को प्रशासन का कोई खौफ नहीं रह गया है।

भय के साए में काम करने को मजबूर कर्मचारी
इस खुली बगावत और डराने-धमकाने के खेल ने अस्पताल प्रशासन की धाक को पूरी तरह खत्म कर दिया है। जब निचले स्तर के कर्मचारी ही शीर्ष अधिकारियों के आदेशों को मानने से इनकार कर रहे हैं और नए प्रभारियों को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं, तो अस्पताल की व्यवस्था का सुचारू रूप से चलना नामुमकिन हो गया है। डरे-सहमे कर्मचारी अब मानसिक तनाव में काम करने को मजबूर हैं।
प्रशासनिक व्यवस्था, नेताओं के फोन कॉल्स और इस अंदरूनी दिखावे की लड़ाई के कारण जिला अस्पताल की व्यवस्था बिगड़ रही है। इतने बड़े पैमाने पर आदेशों की अवहेलना और लिखित शिकायत के बाद भी अब तक किसी भी कर्मचारी के खिलाफ कोई कड़ी दंडात्मक या निलंबन की कार्रवाई नहीं की गई है, जो प्रबंधन की ढुलमुल कार्यप्रणाली और संदिग्ध चुप्पी को उजागर करता है।

*******

You missed

error: Content is protected !!