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एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव

आबकारी विभाग के कुख्यात ऑडियो कांड में एक बेहद शर्मनाक और हैरान करने वाला मोड़ सामने आया है। विभाग के सहायक आयुक्त द्वारा जारी जिस आधिकारिक पत्र (क्रमांक 903/आब./शिका./2026) में साफ तौर पर लिखा गया था कि— “ऑडियो में प्रथम दृष्टया राम सिंह पाटिल बाबू की ही आवाज प्रतीत होती है”— उस जांच रिपोर्ट के सामने आने के बाद अब बाबू ने अपनी साख बचाने के लिए एक नया पैंतरा चला है। काली करतूतों और कोचियों से कमीशनखोरी का खेल उजागर होने जैसे गंभीर आरोपों से बौखलाए मुख्य लिपिक ने खबर लिखने वाले सीनियर जर्नलिस्ट श्री कर्णकांत श्रीवास्तव को मानहानि का नोटिस भेज दिया है।
इसे कहते हैं ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’! जब सरकारी दफ्तर के ऑन-रिकॉर्ड दस्तावेज ने बाबू के झूठ की धज्जियां उड़ा दीं, तब जाकर बाबू ने मीडिया का मुंह बंद करने के लिए कानूनी धमकी का सहारा लिया है।

पहले खुली पोल, फिर आया मानहानि का ‘हथकंडा’
सरकारी मुहर से तय हुआ सच: पहले आबकारी विभाग के सहायक आयुक्त ने खुद अपनी रिपोर्ट में माना कि सोशल मीडिया पर वायरल ऑडियो (जिसमें अवैध शराब बेचने वाले कोचियों से सांठगांठ और कमीशन की सेटिंग की बात थी) में आवाज बाबू राम सिंह पाटिल की ही लग रही है।
फंसती गर्दन देख बौखलाहट: जब इस सरकारी जांच रिपोर्ट के आधार पर मीडिया ने सिलसिलेवार ढंग से पूरी हिस्ट्री जनता के सामने रख दी और बाबू की कुर्सी खतरे में आ गई, तब अपनी इज्जत बचाने के लिए इस मानहानि के नोटिस का ड्रामा रचा गया।
जांच से ध्यान भटकाने की साजिश: यह पूरी तरह से साफ हो चुका है कि मानहानि का यह नोटिस सिर्फ और सिर्फ मुख्य मुद्दे यानी ‘कमिशन खोरी’ और ‘तकनीकी जांच’ से ध्यान भटकाने और पत्रकार पर दबाव बनाने की एक नाकाम प्रशासनिक कोशिश है।

सुबूतों के आगे खोखली साबित होगी गीदड़ भभकी
तथ्यों पर टिकी है पत्रकारिता: पत्रकार ने कोई मनगढ़ंत आरोप नहीं लगाया था। पहले ऑडियो वायरल हुआ और फिर खुद विभाग के अधिकारी ने माना कि आवाज बाबू की ही है। इस पुख्ता हिस्ट्री के बाद लिखी गई खबर पर मानहानि का दावा करना हास्यास्पद है।
अब कोर्ट में फँसेंगे बाबू: मानहानि का नोटिस भेजकर बाबू ने खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है। अब अदालत में इसी सहायक आयुक्त के पत्र को सबसे बड़ा सुबूत बनाकर पेश किया जाएगा, जिससे बाबू की मुश्किलें और ज्यादा बढ़ने वाली हैं।

सीधा सवाल
जब विभाग खुद मान रहा है कि ऑडियो में आवाज बाबू की ही प्रतीत हो रही है, तो तकनीकी शाखा से फॉरेंसिक जांच कराने के बजाय पत्रकारों को डराने में समय क्यों गंवा रहे हैं? क्या नोटिस भेजने से सरकारी कागज पर दर्ज आबकारी विभाग के सहायक आयुक्त के हस्ताक्षर और शब्द बदल जाएंगे?
पत्रकार कर्णकान्त श्रीवास्तव ने कहा कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इन धमकियों से न कभी डरा है और न डरेगा। इस मानहानि के नोटिस का करारा जवाब कानून के दायरे में रहकर जांच रिपोर्ट के आधार पर दे दिया गया है। सच की जीत तय है।

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