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एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव

आबकारी विभाग इन दिनों अपनी कार्यप्रणाली को लेकर कम और विभाग में पनप रहे भ्रष्टाचार के ‘ऑडियो’ को लेकर ज्यादा चर्चा में है। मामला राजनांदगांव जिले का है, जहां सहायक आबकारी आयुक्त कार्यालय में पदस्थ मुख्य लिपिक रामसिंह पाटिल के खिलाफ शिकायतों का अंबार लगने के बाद विभाग ने कागजी खानापूर्ति तो कर दी, लेकिन असली कार्रवाई पर अब भी पर्दा डाला जा रहा है।

अटैचमेंट या ‘सुरक्षित ठिकाना’
सोशल मीडिया पर वायरल हुए सनसनीखेज ऑडियो और भ्रष्टाचार की गंभीर शिकायतों के बाद आबकारी आयुक्त कार्यालय, नवा रायपुर ने आनन-फानन में आदेश जारी कर रामसिंह पाटिल को राजनांदगांव से हटाकर संभागीय उड़नदस्ता, दुर्ग में संलग्न (अटैच) कर दिया है। आदेश में इसे ‘प्रशासकीय कार्य सुविधा’ बताया गया है, लेकिन हकीकत यह है कि यह कार्रवाई नहीं बल्कि आरोपी को बचाने की एक सुरक्षित चाल नजर आती है। सवाल यह उठता है कि क्या विभाग ऐसे संगीन मामलों में केवल ट्रांसफर-पोस्टिंग का खेल खेलकर जनता की आंखों में धूल झोंकना चाहता है?

आबकारी अधिकारियों की ‘रहस्यमयी’ कोताही
हैरानी की बात यह है कि जिस ऑडियो ने पूरे जिले में बवाल मचा रखा है, उस मामले की जांच में स्थानीय आबकारी अधिकारी कछुआ चाल चल रहे हैं। जब पुख्ता सबूत वायरल हैं, तो फिर अब तक विभागीय जांच पूरी कर कठोर दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? चर्चा तो यह भी है कि विभागीय अधिकारी इस मामले को दबाने के लिए भीतर ही भीतर ‘सेटिंग’ में जुटे हुए हैं। जांच में बरती जा रही यह कोताही साफ इशारा करती है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।

भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा खोखला
सरकार एक ओर भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करती है, वहीं दूसरी ओर आबकारी विभाग के जिम्मेदार अधिकारी गंभीर शिकायतों के बावजूद अपने ही महकमे के रसूखदार कर्मचारियों पर हाथ डालने से कतरा रहे हैं। रामसिंह पाटिल को राजनांदगांव से रिलीव कर देना पर्याप्त नहीं है। जनता पूछ रही है कि वायरल ऑडियो की प्रमाणिकता की जांच में देरी क्यों? क्या उन अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई होगी जो जांच को प्रभावित कर रहे हैं?

क्या होगा अगला कदम?
यदि जल्द ही इस मामले में निष्पक्ष जांच और ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो विभाग की साख पूरी तरह मिट्टी में मिल जाएगी। राजनांदगांव के जागरूक नागरिक मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों से करने की तैयारी में हैं। आबकारी विभाग को यह समझना होगा कि अटैचमेंट किसी अपराध की सजा नहीं होती। आरोपी लिपिक पर अब तक गाज न गिरना कहीं न कहीं बड़े संरक्षण की ओर इशारा कर रहा है।
अब देखना यह होगा कि आबकारी विभाग के ‘आका’ अपनी नींद कब तोड़ते हैं या फिर भ्रष्टाचार का यह खेल इसी तरह निर्बाध चलता रहेगा।

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