एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
छत्तीसगढ़ आबकारी विभाग में नियमों को जेब में लेकर घूमने वाले अधिकारियों और रसूखदार कर्मचारियों का एक ऐसा कारनामा सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है। मंत्रालय द्वारा 16 सितंबर 2026 को जारी कड़े तबादला आदेश को जारी हुए आज 25 दिन से अधिक का समय बीत चुका है। इसके बावजूद राजनांदगांव कार्यालय के मुख्य लिपिक रामसिंह पाटिल आज भी सीना ताने उसी कुर्सी पर जमे हुए हैं, जहां से उन्हें तत्काल हटने का हुक्म मिला था।
मंत्रालय के ‘एकपक्षीय भारमुक्त’ क्लॉज का उड़ाया मखौल
आदेश की कंडिका 2 में साफ शब्दों में लिखा था कि स्थानांतरित कर्मचारियों को ‘तत्काल प्रभाव से एकपक्षीय भारमुक्त’ किया जाता है और उनका वेतन भी पुरानी जगह से नहीं निकाला जा सकता। इसके बावजूद आज अक्टूबर महीने के दूसरे हफ्ते तक पाटिल का राजनांदगांव कार्यालय में डटे रहना यह साबित करता है कि स्थानीय आबकारी अधिकारियों को रायपुर (मंत्रालय) में बैठे अपने ही उच्चाधिकारियों और शासन के आदेशों का रत्ती भर भी खौफ नहीं है।
एक कर्मचारी को तत्काल कोण्डागांव जाने कहा, पाटिल पर मेहरबानी क्यों?
इस मामले में विभाग का दोहरा चेहरा पहले ही बेनकाब हो चुका है। जहां एक तरफ अवकाश पर चल रहे सहायक ग्रेड-2 हरगोविंद वर्मा को नियम का हवाला देकर तत्काल कोण्डागांव के लिए कार्यमुक्त (रिलीव) कर दिया गया, वहीं दूसरी तरफ मुख्य लिपिक रामसिंह पाटिल को बचाने के लिए आबकारी विभाग ने अपनी आंखें मूंद ली हैं। एक ही आदेश पर दो अलग-अलग कर्मचारियों के लिए यह दोहरी नीति साफ इशारा करती है कि राजनांदगांव आबकारी विभाग में नियमों से ज्यादा ‘अधिकारियों की व्यक्तिगत सेटिंग’ मायने रखती है।
क्या राजनांदगांव के वित्तीय लेन-देन और ‘राज’ छुपाने की है मजबूरी?
विभाग के गलियारों में अब यह चर्चा आम हो चली है कि आखिर पाटिल में ऐसा क्या खास है जो उन्हें बलरामपुर-रामानुजगंज भेजने में अधिकारियों के हाथ-पांव फूल रहे हैं?
क्या मुख्य लिपिक के पास राजनांदगांव कार्यालय के कुछ ऐसे वित्तीय राज या गोपनीय दस्तावेज हैं, जिनके ट्रांसफर होते ही अधिकारियों की पोल खुल जाएगी?
क्या जानबूझकर पाटिल को राजनांदगांव में रोके रखकर किसी बड़े खेल या पिछले वित्तीय रिकॉर्ड्स को ‘मैनेज’ करने का समय दिया जा रहा है?
जनता पूछ रही है सीधे सवाल:
25 दिन बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं? क्या राजनांदगांव के आबकारी अधिकारी छत्तीसगढ़ शासन के आदेशों से भी ऊपर हो चुके हैं?
बिना रिलीव हुए वेतन कैसे? जब आदेश में स्पष्ट था कि वर्तमान स्थापना से वेतन नहीं आहरित होगा, तो पाटिल के वित्तीय अधिकारों को अब तक फ्रीज क्यों नहीं किया गया?
उच्चाधिकारी मौन क्यों? आबकारी कमिश्नर और मंत्रालय के बड़े अधिकारी इस खुली बगावत और लापरवाही पर राजनांदगांव के जिम्मेदार अधिकारियों को सस्पेंड क्यों नहीं कर रहे?
यह मामला अब सिर्फ एक कर्मचारी के ट्रांसफर का नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे-सीधे प्रशासनिक अनुशासन और शासन के धाक को चुनौती है। देखना होगा कि इस गंभीर मामले पर रायपुर से कब हंटर चलता है या फिर पाटिल इसी तरह नियमों को ठेंगे पर रखकर राजनांदगांव में जमे रहेंगे।
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