एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
शासकीय जिला चिकित्सालय राजनांदगांव में वर्ष 2024-25 के दौरान हुए करीब 30 लाख रुपये के बहुचर्चित फर्नीचर खरीदी घोटाले और उसके बाद संलिप्त कर्मचारियों को बचाने के लिए रचे गए अंतर-जिला ‘प्रमोशन-तबादला खेल’ ने अब ज़िला प्रशासन के मुखिया की भूमिका को सीधे तौर पर बेहद गंभीर कठघरे में खड़ा कर दिया है। सजग नागरिकों द्वारा पुख्ता दस्तावेजी प्रमाणों के साथ घोटाले का भंडाफोड़ करने और फरवरी 2026 में ही आधिकारिक शिकायत दर्ज कराने के बावजूद, आज तक पूरे 7 महीने बीत जाने पर भी ज़िला प्रमुख का इस संवेदनशील मामले में चुप रहना, सीधे तौर पर प्रशासनिक संरक्षण की ओर इशारा करता है।
जिला प्रशासन की नाक के नीचे होता रहा साक्ष्यों का मर्डर, फिर भी मौन क्यों?
पूरे ज़िले की प्रशासनिक कानून-व्यवस्था और शासकीय संपत्तियों के रख-रखाव के सर्वोच्च ज़िम्मेदार खुद जिला प्रशासन होती है। जब शिकायतकर्ता ने वर्ष 2024-25 के ऑन-रिकॉर्ड दस्तावेजों से यह साबित कर दिया कि बिना किसी वैध ‘प्रशासकीय स्वीकृति’ के वित्तीय नियमों की धज्जियां उड़ाकर बिल पास किए गए हैं, तो पिछले वर्षों (2021 से चालू वर्ष) के अन्य संभावित घोटालों के सबूतों को छुपाने के लिए अस्पताल प्रबंधन ने ‘रिकॉर्ड रूम में पानी भरने’ का घिसा-पिटा बहाना बना दिया। खुद सिविल सर्जन ने पत्र जारी कर इसे ‘प्राकृतिक आपदा’ बताते हुए सरकारी रिकॉर्ड के नष्ट होने को क्लीन चिट दे दी। सवाल यह उठता है कि ज़िले के मुखिया ने इस भयंकर प्रशासनिक लापरवाही और साक्ष्यों को नष्ट करने की इस खुली साज़िश पर अब तक स्वतः संज्ञान क्यों नहीं लिया? क्या सरकारी दस्तावेज़ों को पानी में बहा देना कोई मामूली बात है?
गोपनीय चरित्रावली (CR) से खिलवाड़ और ‘सेफ एग्जिट’ पर भी चुप्पी?
इस मामले का सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियम की सरेआम धज्जियां उड़ाकर इस संलिप्त लेखापाल की गोपनीय चरित्रावली (CR) के सारे दाग रातों-रात धो दिए गए। जब ज़िले में एक इतने बड़े घोटाले की आंतरिक जांच (पांच सदस्यीय समिति द्वारा भौतिक सत्यापन) लंबित थी, तो जिला प्रमुख की अध्यक्षता या निगरानी में होने वाली प्रशासनिक प्रक्रियाओं को ठेंगा दिखाकर संलिप्त लेखापाल को प्रमोट कर ‘मुख्य लिपिक’ कैसे बना दिया गया? इतना ही नहीं, स्थानीय मीडिया और जांच के शिकंजे से बचाने के लिए उसे बड़ी ही शातिरता से पड़ोसी जिले खैरागढ़-छुईखदान-गंडई में मलाईदार पोस्टिंग के साथ ट्रांसफर कर दिया गया। ज़िले के भीतर चल रहे इस पूरे ‘सेफ एग्जिट’ मास्टरप्लान पर जिला प्रशासन का मौन रहना यह साफ जाहिर करता है कि या तो ज़िला प्रशासन इस भ्रष्ट सिंडिकेट के आगे पूरी तरह पंगु और असहाय हो चुका है, या फिर जानबूझकर इस मामले पर पर्दा डाला जा रहा है।
जिला प्रशासन की चुप्पी से जनता का भरोसा टूटा, लोकतंत्र पर हावी हुआ लूटतंत्र
यह वही मामला है जिसकी गूंज छत्तीसगढ़ विधानसभा के सदन तक में सुनाई दी थी। लेकिन राजनांदगांव कलेक्ट्रेट में पसरा यह अंतहीन सन्नाटा चीख-चीख कर कह रहा है कि यहाँ ‘कानून के राज’ का सरेआम मर्डर कर ‘लूटतंत्र’ को स्थापित कर दिया गया है। जब खुली वित्तीय अनियमितताओं, गायब होते सरकारी रिकॉर्ड और नियम विरुद्ध प्रमोशन-तबादलों पर भी जिला प्रशासन का हंटर नहीं चलता, तो यह ज़िले की जागरूक जनता के साथ एक खुला विश्वासघात है। जिला अस्पताल में गरीब जनता आज भी बुनियादी सुविधाओं और इलाज के लिए भटक रही है, और ज़िला प्रशासन का पूरा शीर्ष नेतृत्व मौन साधकर भ्रष्टाचारियों के हौसलों को सातवें आसमान पर पहुंचा रहा है।
अब राजनांदगांव की जनता सीधे सवाल पूछ रही है कि दागी कर्मचारियों को खुली छूट देने वाले अस्पताल प्रबंधन के साथ-साथ इस पूरे मामले पर हाथ पर हाथ धरे बैठे ज़िम्मेदार प्रशासनिक अधिकारियों पर कब और क्या दंडात्मक कार्रवाई होगी?
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