IMG-20241026-WA0010
IMG-20241026-WA0010
previous arrow
next arrow

एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव

‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’ की कहावत छत्तीसगढ़ के आबकारी विभाग पर बिल्कुल सटीक बैठती है। राजनांदगांव के ग्राम मोहरा में पुलिस ने जिस अवैध शराब बॉटलिंग और नकली पैकिंग यूनिट का भंडाफोड़ किया था, उस रोंगटे खड़े कर देने वाले मामले को बीते कई दिन हो चुके हैं। इसके बाद भी जिला आबकारी विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों पर निलंबन तो दूर, एक अदद कारण बताओ नोटिस तक जारी नहीं हुआ है। शासन-प्रशासन की इस रहस्यमयी चुप्पी ने अब यह साफ़ कर दिया है कि विभाग के आला अफ़सरों को बड़ी से बड़ी लापरवाही के बाद भी वीआईपी संरक्षण हासिल है, जबकि जनता की जान को शराब माफियाओं के भरोसे छोड़ दिया गया है।

Crime reporter@राजनांदगांव: आबकारी विभाग की सोई आत्मा को कब जगाएगा शासन? भानुप्रतापपुर में सस्पेंशन, तो राजनांदगांव के मेहरबानों पर रहम क्यों?

कांकेर में सिंघम बनने वाला विभाग राजनांदगांव में मौन क्यों?

याद करिए कुछ दिनों पहले कांकेर (भानुप्रतापपुर) में हुई ऐसी ही कार्रवाई को, जहाँ खाली मकान से शराब सामग्री मिलते ही आबकारी मंत्रालय ने 24 घंटे के भीतर सहायक जिला आबकारी अधिकारी को सस्पेंड कर लाइन हाजिर कर दिया था। लेकिन राजनांदगांव आते ही आबकारी विभाग के नियमों और कार्रवाई की धार को कौन सा जंग लग गया? यहाँ भी अवैध अंग्रेजी शराब मिली, हजारों फर्जी स्टीकर मिले और हजारों नकली ढक्कन-लेबल बरामद हुए। जब अपराध का कृत्य, खतरा और लापरवाही का स्तर दोनों जिलों में एक समान है, तो कार्रवाई में यह ‘दो रवैया’ क्यों? क्या राजनांदगांव के आबकारी अमले की लापरवाही कांकेर के अफ़सरों से कमतर है, या फिर यहाँ किसी रसूखदार की काली कमाई को बचाने का खेल चल रहा है?

पुलिस की मुस्तैदी ने बचाया, वरना बट जाती ‘जहरीली मौत’
मोहरा के उस सुनसान खेत में चल रहा यह सिंडिकेट कोई छोटा-मोटा धंधा नहीं था। ब्रांडेड बोतलों में नकली और मिलावटी शराब भरकर गांवों में खपाने की पूरी तैयारी थी। अगर राजनांदगांव पुलिस और साइबर सेल ने समय पर दबिश न दी होती, तो आज जिला किसी बड़ी शराब त्रासदी का गवाह बन चुका होता। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे शर्मनाक भूमिका आबकारी विभाग की रही, जिनका मूल काम ही इस समानांतर अवैध नेटवर्क को ध्वस्त करना है। पुलिस अपनी जान जोखिम में डालकर आरोपियों को सलाखों के पीछे भेज रही है, और आबकारी के साहबान अपनी कुर्सी बचाने के लिए मंत्रालय में फ़ाइलें दबाकर बैठे हैं।

कुर्सी से इतना मोह क्यों? जनता पूछ रही तीखे सवाल
इस मामले में अभी तक कोई प्रशासनिक या दंडात्मक कार्रवाई न होना कई गंभीर और तीखे सवाल खड़े करता है:
क्या जिला आबकारी अधिकारी और उनके मातहत निरीक्षकों का खुफिया तंत्र इतना कमजोर है कि उन्हें अपने ही क्षेत्र में चल रही बॉटलिंग यूनिट की भनक तक नहीं लगी?
अगर भनक नहीं थी, तो यह ‘घोर प्रशासनिक अक्षमता’ है, जिसके लिए उन्हें तुरंत पद से हटाया जाना चाहिए।
और अगर विभाग को सब पता था और आंखें मूंद ली गई थीं, तो यह ‘माफिया-अफसर गठजोड़’ का सीधा प्रमाण है, जिसकी जांच उच्च स्तरीय एजेंसी से होनी चाहिए।

जीरो टॉलरेंस सिर्फ कागजों पर, जवाबदेही तय करे सरकार
राजनांदगांव की जनता और सजग नागरिक अब शासन से सीधे जवाब मांग रहे हैं। एक ही राज्य में आबकारी विभाग दो अलग-अलग जिलों के लिए दो अलग कानून नहीं चला सकता। कार्रवाई न होना सीधे तौर पर शराब माफियाओं के हौसलों को बुलंद करने जैसा है। यदि राजनांदगांव के लापरवाह आबकारी अफ़सरों को तुरंत निलंबित नहीं किया गया, तो यह साफ़ हो जाएगा कि छत्तीसगढ़ में ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ का नारा सिर्फ कागज़ों तक सीमित है और ज़मीनी हक़ीक़त में लापरवाह अफ़सरों की कुर्सियां पूरी तरह सुरक्षित हैं।

*******

You missed

error: Content is protected !!