एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
छत्तीसगढ़ में आबकारी विभाग का तंत्र इस कदर पंगु और आंख मूंदकर बैठने का आदी हो चुका है कि जब तक पुलिस विभाग माफियाओं के गिरेबान तक न पहुंच जाए, तब तक आबकारी के साहबों को अपने इलाके में चल रहे अवैध कारोबार की भनक तक नहीं लगती। भानुप्रतापपुर में भारी मात्रा में अवैध शराब सामग्री मिलने के बाद शासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सहायक जिला आबकारी अधिकारी को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि वही पाप, वही खेल और वैसी ही गंभीर प्रशासनिक चूक जब राजनांदगांव में दोहराई गई, तो यहाँ के जिम्मेदार आबकारी अधिकारियों पर अब तक निलंबन की गाज क्यों नहीं गिरी? क्या राजनांदगांव के आबकारी अमले को कानून और जवाबदेही से कोई विशेष छूट मिली हुई है?
बोर घर में सजे मौत के सामान से बेखबर रहा आबकारी अमला
राजनांदगांव के ग्राम मोहरा में एक खेत के बोर घर के भीतर महीनों से शराब की अवैध बॉटलिंग, पैकिंग और मिलावटखोरी का एक बहुत बड़ा सिंडिकेट चल रहा था। पुलिस की साइबर सेल और स्थानीय चौकी की संयुक्त टीम ने दबिश देकर वहां से उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ निर्मित सैकड़ों पौवा अंग्रेजी शराब, स्टीकर, नकली लेबल पर्चियां और सैकड़ों खाली बोतलें बरामद कीं। यह पूरी बरामदगी चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है कि जिले में बड़े पैमाने पर ब्रांडेड कंपनियों के नाम पर जहरीली और नकली शराब खपाने का एक समानांतर नेटवर्क सक्रिय था। आबकारी विभाग का काम सिर्फ शराब दुकानों से राजस्व वसूलना नहीं, बल्कि ऐसे अवैध निर्माण और मिलावटखोरी पर सतत निगरानी रखना भी है। लेकिन विभाग के मैदानी अफसर दफ्तरों के वातानुकूलित कमरों से बाहर निकलने की जहमत ही नहीं उठा सके।
जब गुनाह एक जैसा, तो कार्रवाई में दोहरा मापदंड क्यों?
भानुप्रतापपुर के मामले में मंत्रालय ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा था कि “इतनी बड़ी मात्रा में अवैध सामग्री का पाया जाना प्रभावी पर्यवेक्षण और सतत निगरानी के स्पष्ट अभाव को दर्शाता है।” यदि यही पैमाना सच है, तो राजनांदगांव के आबकारी अधिकारी इस गंभीर लापरवाही के दोषी क्यों नहीं हैं? क्या किसी खेत के बोर घर में सैकड़ों लीटर बाहरी राज्य की शराब आ जाना और हजारों की संख्या में फर्जी लेबल व ढक्कन डंप हो जाना आबकारी विभाग की विफलता नहीं है? यह सीधे तौर पर विभागीय इंटेलिजेंस का पूरी तरह ध्वस्त होना है। जनता यह पूछ रही है कि जब अपराध का तरीका, उसकी गंभीरता और समाज के लिए उसका खतरा दोनों मामलों में बिल्कुल एक समान है, तो एक जिले के अधिकारी को सजा और दूसरे जिले के अधिकारियों को अभयदान क्यों दिया जा रहा है?
खुफिया तंत्र फेल या फिर जानबूझकर साधी गई चुप्पी?
यह चूक साधारण नहीं है, यह एक बहुत बड़ी प्रशासनिक लापरवाही है जो आबकारी विभाग की नियत पर भी सवाल खड़े करती है। या तो जिले का आबकारी अमला पूरी तरह अक्षम हो चुका है जिसे अपने ही नाक के नीचे चल रहे इतने बड़े गोरखधंधे की खबर नहीं थी, या फिर जानबूझकर इस अवैध बॉटलिंग यूनिट को फलने-फूलने के लिए संरक्षण दिया जा रहा था। दोनों ही परिस्थितियों में, जिले के संबंधित आबकारी निरीक्षक और आला अधिकारी अपने पद पर बने रहने के योग्य नहीं हैं।
क्या मौतों का इंतजार कर रहा है शासन?
अवैध बॉटलिंग यूनिट का सीधा मतलब होता है—नकली और मिलावटी शराब का निर्माण। पूर्व में कई राज्यों और स्वयं छत्तीसगढ़ में भी मिलावटी शराब पीने से कई घर तबाह हो चुके हैं। राजनांदगांव पुलिस ने सूझबूझ दिखाते हुए एक बड़े संभावित हादसे को टाल दिया, लेकिन आबकारी विभाग की यह घोर लापरवाही अक्षम्य है। शासन को बिना किसी भेदभाव और बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव के, राजनांदगांव के भी आबकारी अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित करना चाहिए। जब तक इन लापरवाह कुर्सियों पर बैठी जवाबदेही को हिलाया नहीं जाएगा, तब तक शराब माफिया इसी तरह छत्तीसगढ़ के गांवों में समांतर सरकार चलाते रहेंगे।
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