IMG-20241026-WA0010
IMG-20241026-WA0010
previous arrow
next arrow

एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव

शासकीय जिला चिकित्सालय राजनांदगांव में वर्ष 2024-25 के दौरान हुए करीब 30 लाख रुपये के बहुचर्चित फर्नीचर खरीदी घोटाले में प्रशासनिक साठगांठ और बेशर्मी का एक ऐसा सनसनीखेज अध्याय जुड़ गया है, जिसने छत्तीसगढ़ के पूरे शासकीय सिस्टम को शर्मसार कर दिया है। सजग नागरिकों द्वारा आरटीआई के जरिए 30 लाख रुपये के ऑन-रिकॉर्ड घोटाले का भंडाफोड़ करने और पिछले 5 सालों के अन्य संभावित घोटालों के सबूतों को रिकॉर्ड रूम में ‘जलमग्न’ कर नष्ट करने की साजिश उजागर होने के बाद, भ्रष्ट सिंडिकेट ने मुख्य संलिप्त अधिकारी, कर्मचारियों और लेखापाल को बचाने के लिए एक मास्टरप्लान तैयार किया। इन दागी चेहरों को सजा देने या सस्पेंड करने के बजाय, विभागीय आकाओं ने गोपनीय चरित्रावली के सारे दाग रातों-रात धोकर लेखापाल से प्रमोट कर ‘मुख्य लिपिक’ बना दिया और बड़ी ही शातिरता से उसे पड़ोसी जिले खैरागढ़-छुईखदान-गंडई (KCG) में ट्रांसफर कर दिया।

Health reporter@राजनांदगांव: घोटाले की ‘क्रोनोलॉजी’; फर्नीचर कांड खुलते ही घबराया अस्पताल प्रबंधन, पिछले 5 सालों के पाप छुपाने रिकॉर्ड रूम में जानबूझकर ‘बहाया पानी’, संलिप्त लेखापाल और साथी कर्मचारियों पर मेहरबान सिविल सर्जन…!

शिकायत पेंडिंग, विधानसभा में बवाल, फिर भी खैरागढ़ में मलाईदार पोस्टिंग
यह कोई सामान्य प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि एक बड़े वित्तीय संलिप्त को कानून के शिकंजे और स्थानीय मीडिया के दबाव से दूर सुरक्षित ठिकाने पर बिठाने का ‘सेफ एग्जिट’ प्लान है। जबकि इस मामले की शिकायत फरवरी 2026 में ही दर्ज करा दी गई थी। मामला छत्तीसगढ़ विधानसभा सत्र में भी जोर-शोर से गूंजा था।
छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम के तहत जिस कर्मचारी के खिलाफ वित्तीय धोखाधड़ी की आंतरिक जांच पेंडिंग हो, उसका प्रमोशन तत्काल रोक दिया जाना चाहिए था। लेकिन राजनांदगांव के सिविल सर्जन सह अस्पताल अधीक्षक से लेकर जिला कोषालय के जिम्मेदार अफसरों की रहस्यमयी चुप्पी और साठगांठ के चलते, संलिप्त को न केवल क्लीन चिट मिली, बल्कि उसे खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के स्वास्थ्य महकमे में मुख्य लिपिक जैसी सबसे रसूखदार और मलाईदार कुर्सी पर री-इंस्टॉल कर दिया गया।

रिकॉर्ड रूम में ‘जलमग्न साज़िश’ रचकर छुपाए गए थे पिछले 5 सालों के पाप
इस क्रोनोलॉजी (क्रम) को समझिए—जब शिकायतकर्ताओं ने वर्ष 2024-25 के ऑन-रिकॉर्ड दस्तावेजों से यह साबित कर दिया कि बिना किसी वैध ‘प्रशासकीय स्वीकृति’ के बिलों को पास कराकर 30 लाख रुपये का महा-फर्जीवाड़ा किया गया है, तो सिंडिकेट घबरा गया। उन्हें डर था कि यदि पिछले वर्षों (2021 से चालू वर्ष तक) का रिकॉर्ड भी सामने आ गया तो फर्नीचर कांड पार्ट-2 का भंडाफोड़ हो जाएगा।
यही वजह थी कि जब आरटीआई में पुराना रिकॉर्ड मांगा गया, तो अस्पताल प्रबंधन ने ‘भूतल में जलभराव के कारण दस्तावेज नष्ट होने’ की मनगढ़ंत कहानी बना दी। खुद सिविल सर्जन ने 17/06/2026 को पत्र जारी कर इसे ‘प्राकृतिक आपदा’ बताते हुए आरोपियों को अभयदान दिया था। और अब, उसी अभयदान की अंतिम कड़ी के रूप में लेखापाल को खैरागढ़ जिले का मुख्य लिपिक बनाकर भेज दिया गया है, ताकि राजनांदगांव में पेंडिंग पड़ी जांच फाइलें हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में दफन हो जाएं।

आज दिनांक तक कार्रवाई ‘शून्य’, क्या सो गए हैं जिम्मेदार?
इस पूरे मामले में सबसे आक्रोशित करने वाली हकीकत यह है कि शिकायत के 7 महीने बीत जाने के बाद भी आज दिनांक तक दोषियों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। राजनांदगांव जिला प्रशासन की यह अंतहीन निष्क्रियता यह साफ बयां कर रही है कि यहाँ नियमों का नहीं, बल्कि संगठित ‘लूटतंत्र’ का सिक्का चलता है। एक संलिप्त को प्रमोट करके दूसरे जिले में ट्रांसफर कर देना सीधे तौर पर खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले के प्रशासनिक ढांचे के साथ भी एक भद्दा मजाक है।
जागरूक नागरिकों और शिकायतकर्ता द्वारा अब इस जालसाजी और नियम विरुद्ध किए गए प्रमोशन-तबादले को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने की मांग की जा रही है।

*******

You missed

error: Content is protected !!