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एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव

शासकीय जिला चिकित्सालय राजनांदगांव में भ्रष्टाचार और प्रशासनिक ढिटाई का एक ऐसा सनसनीखेज सिंडिकेट बेनकाब हुआ है, जिसने सरकारी शुचिता के परखच्चे उड़ा दिए हैं। सजग जागरूक नागरिकों ने जब अपनी पैनी नजरों और पुख्ता कोशिशों से अस्पताल में वर्ष 2024-25 के दौरान हुए करीब 30 लाख रुपये के फर्नीचर खरीदी घोटाले का आधिकारिक रिकॉर्ड निकाल लिया और इस महा-फर्जीवाड़े को उजागर कर दिया, तो अस्पताल के भीतर हड़कंप मच गया।
इस भंडाफोड़ के बाद जब शिकायतकर्ता को यह आशंका हुई कि पिछले वर्षों में भी इसी तरह का बड़ा खेल खेला गया होगा, तो उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत वर्ष 2021 से लेकर चालू वर्ष तक का पूरा खरीदी और भौतिक सत्यापन रिकॉर्ड मांग लिया। बस, यहीं से अस्पताल प्रबंधन की नीयत डोल गई। पिछले 5 सालों के काले कारनामों और इसी तर्ज पर हुए अन्य संभावित घोटालों के सबूतों को छुपाने के लिए प्रबंधन ने लिखित में एक ऐसा हास्यास्पद और घिसा-पिटा बहाना बना दिया कि “दस्तावेज भूतल में जलभराव के कारण डूबकर नष्ट हो गए हैं”

Health reporter@राजनांदगांव: फरवरी से दबाई जा रही घोटाले की फाइल, फर्नीचर कांड में संलिप्त लेखापाल और साथी कर्मचारियों पर मेहरबान हुआ तंत्र, 7 महीने बाद भी कार्रवाई शून्य, उल्टा थमा दिया ‘मुख्य लिपिक’ का मलाईदार प्रमोशन…

 

फर्नीचर कांड पार्ट-2 दबाने के लिए रची गई ‘जलमग्न साज़िश’
यह कोई सामान्य प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सबूतों का सुनियोजित मर्डर है। जब वर्ष 2024-25 के आधिकारिक रिकॉर्ड ने अस्पताल की पोल खोल दी कि बिना किसी वैध ‘प्रशासकीय स्वीकृति’ के वित्तीय नियमों की धज्जियां उड़ाकर बिल पास किए गए हैं, तो पिछले वर्षों के रिकॉर्ड का सामने आना भ्रष्ट सिंडिकेट की सीधी जेल यात्रा तय कर देता। यही वजह है कि आरटीआई के जवाब में 2021 से 2024 तक के रिकॉर्ड को ‘पानी में डूबा’ बताकर निरंक कर दिया गया, ताकि पिछले वर्षों का कोई ऑडिट या भौतिक मिलान कभी हो ही न सके।

सिविल सर्जन बने ढाल, ‘प्राकृतिक आपदा’ का फर्जी नाटक रच दागियों को दिया अभयदान
इस साज़िश की कड़ियां तब पूरी तरह जुड़ गईं जब रिकॉर्ड नष्ट होने और छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियम, के खुले उल्लंघन पर संलिप्त लेखापाल और साथी कर्मचारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई के लिए फरवरी 2026 में लिखित शिकायत की गई। पूरे 7 महीने बीत जाने के बाद भी आज दिनांक 24 सितंबर 2026 तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है
उल्टा, सिविल सर्जन सह अस्पताल अधीक्षक ने अपने पत्र में लिखित रूप से यह तर्क देकर आरोपियों को अभयदान दे दिया कि “यह अचानक आई प्राकृतिक आपदा थी, इसमें किसी भी अधिकारी या कर्मचारी की जिम्मेदारी प्रतीत नहीं होती है”। जब अधिकारी और कर्मचारियों को पहले से पता था कि भूतल में विगत वर्षों से जलभराव की समस्या थी, तो जानबूझकर लाखों के टेंडर और खरीदी दस्तावेजों को उसी असुरक्षित स्थान पर सड़ने के लिए क्यों छोड़ा गया? यह साफ़ तौर पर कर्मचारियों और अस्पताल प्रबंधन की आपसी साठगांठ को प्रमाणित करता है।

पुरस्कार में मिला ‘मुख्य लिपिक’ का पद, संलिप्त कर्मचारियों की मुट्ठी में पूरी तिजोरी
इस पूरे खेल की सबसे शर्मनाक पराकाष्ठा देखिए कि एक तरफ फरवरी 2026 से शिकायत पेंडिंग है, आरटीआई में रिकॉर्ड छुपाए जा रहे हैं, मामला विधानसभा तक गूंज चुका है—लेकिन सिस्टम की बेशर्मी ऐसी है कि संलिप्त लेखापाल की गोपनीय चरित्रावली (CR) से सारे दाग साफ कर उसे लेखापाल से प्रमोट कर सीधे ‘मुख्य लिपिक’ की मलाईदार कुर्सी सौंप दी गई। वहीं संलिप्त अन्य कर्मचारी संशोधित आदेश के जरिए अस्पताल के महत्वपूर्ण प्रभाग के सर्वेसर्वा बन बैठे है और जांच की फाइलों को दबाने में लगे हैं।

जिला प्रशासन का महा-मौन, लोकतंत्र पर लूटतंत्र हावी
कलेक्ट्रेट से लेकर जिला कोषालय तक फैला यह महा-सन्नाटा चीख-चीख कर कह रहा है कि राजनांदगांव जिला अस्पताल में कानून का नहीं, बल्कि संगठित ‘लूटतंत्र’ का राज चल रहा है। 30 लाख का घोटाला ऑन-रिकॉर्ड पकड़ में आने और पिछले रिकॉर्ड को पानी में बहाने की इस खुली साज़िश पर भी किसी स्तर पर कार्रवाई का शून्य होना यह साबित करता है कि रक्षक ही भक्षकों के सबसे मजबूत पैरोकार बन चुके हैं। जनता अब सीधे मांग कर रही है कि इस भ्रष्ट सिंडिकेट और अवैध प्रमोशन को तत्काल निरस्त कर मामले की जांच स्वतंत्र एजेंसी को सौंपी जाए।

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