एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
जिला चिकित्सालय राजनांदगांव के 100 बिस्तर मातृ शिशु अस्पताल (SNCU विभाग) में नर्सिंग स्टाफ से बदसलूकी और ड्यूटी से गायब रहने के गंभीर आरोपों में घिरे डॉ. विक्रम वैद्य को भले ही प्रभार से मुक्त कर दिया गया हो, लेकिन इस पूरी कार्रवाई के पीछे की क्रोनोलॉजी बेहद संदेहास्पद नजर आ रही है। सिविल सर्जन सह मुख्य अस्पताल अधीक्षक द्वारा 28 जुलाई 2026 को जारी आदेश में डॉ. विक्रम वैद्य को एस.एन.सी.यू. विभाग के प्रभारी पद से हटाकर डॉ. कमलेश जंघेल को कमान सौंप दी गई है। ऊपर से देखने पर यह सख्त एक्शन लग सकता है, लेकिन हकीकत यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में केवल जांच के नाम पर खानापूर्ति की गई है और मामले को रफा-दफा करने की पूरी स्क्रिप्ट तैयार कर ली गई है।
जांच से सिविल सर्जन को रखा बहार, दाल में कुछ काला है
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सवाल यह उठ रहा है कि इतनी बड़ी शिकायत और गंभीर मामले की जांच के लिए जो दल गठित किया गया, उसमें सिविल सर्जन को शामिल क्यों नहीं किया गया? अस्पताल के सबसे बड़े प्रशासनिक अधिकारी को ही इस पूरी जांच प्रक्रिया से दूर रख दिया गया। आखिर किसके दबाव में सिविल सर्जन को इस जांच दल से बाहर रखा गया? क्या प्रशासन को इस बात का डर था कि निष्पक्ष जांच हुई तो कई और बड़े चेहरों के नकाब उतर जाएंगे? किसी भी बड़े मामले में उच्च अधिकारी की निगरानी जरूरी होती है, लेकिन यहां ‘सिविल सर्जन’ को दूर रखना साफ इशारा करता है कि डॉक्टर को बचाने के लिए पर्दे के पीछे तगड़ी सेटिंग चल रही है।
गंभीर आरोपों पर पर्दा: सिर्फ प्रभार से हटाना क्या काफी है?
छत्तीसगढ़ प्रदेश स्वास्थ्य कर्मचारी संघ ने डॉ. विक्रम वैद्य पर जो आरोप लगाए थे, वे केवल दुर्व्यवहार तक सीमित नहीं थे। उन पर सबसे गंभीर आरोप यह था कि वे सरकारी ड्यूटी के समय लगातार नदारद रहते हैं और उस दौरान प्राइवेट अस्पतालों में अपनी ‘दुकान’ चलाते हैं। यह सीधे-सीधे सरकारी खजाने को चूना लगाने और मरीजों की जान से खिलवाड़ करने का आपराधिक कृत्य है। इतने गंभीर आरोपों के बाद कायदे से डॉक्टर को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया जाना चाहिए था और विभागीय जांच (F.I.R. या विभागीय कड़े एक्शन) बैठानी चाहिए थी। लेकिन प्रशासन ने सिर्फ ‘प्रभार बदलना’ ही मुनासिब समझा। क्या किसी अधिकारी को एक कुर्सी से हटाकर दूसरी कुर्सी पर बैठा देना ही सजा है?
नर्सिंग स्टाफ के आक्रोश को दबाने की कोशिश
यह कार्रवाई कोई न्याय देने के लिए नहीं, बल्कि नर्सिंग स्टाफ के बढ़ते आक्रोश और आंदोलन की चेतावनी को दबाने के लिए की गई एक सोची-समझी चाल है। कर्मचारी संघ ने उग्र आंदोलन और नारेबाजी की चेतावनी दी थी, जिससे डरकर अस्पताल प्रशासन ने आनन-फानन में यह ‘लॉलीपॉप’ थमा दिया ताकि मामला शांत हो जाए। डॉक्टर साहब अभी भी शिशु रोग विशेषज्ञ के पद पर अस्पताल में ही जमे रहेंगे, जिससे शिकायत करने वाले स्टाफ पर दबाव और डर का माहौल बरकरार रहेगा।
जनता पूछ रही सवाल: कब तक चलेगी यह रफा-दफा की संस्कृति?
राजनांदगांव की जनता और स्वास्थ्य कर्मचारी अब प्रशासन से तीखे सवाल पूछ रहे हैं। सीसीटीवी (CCTV) फुटेज खंगालकर डॉक्टर के गायब रहने की टाइमिंग की जांच क्यों नहीं की गई? प्राइवेट अस्पतालों में उनकी सेवा देने के दावों पर कड़ा एक्शन क्यों नहीं हुआ? क्या रसूखदार डॉक्टरों के लिए नियम-कानून अलग हैं? सिर्फ प्रभार से हटाकर मामले की फाइल को बंद कर देना यह साबित करता है कि जिला अस्पताल प्रशासन भ्रष्टाचार और लापरवाही को संरक्षण देने का अड्डा बन चुका है।
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