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एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव

शासकीय जिला चिकित्सालय राजनांदगांव और जिले के स्वास्थ्य महकमे में न्याय और नियमों का किस कदर मखौल उड़ाया जा रहा है, इसका एक ऐसा घिनौना और दोहरा चरित्र आधिकारिक दस्तावेजों के साथ बेनकाब हुआ है जिसे देखकर समूचे छत्तीसगढ़ की जनता का प्रशासनिक व्यवस्था से भरोसा उठ जाएगा। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, मरीजों को निजी सोनोग्राफी सेंटर की पर्ची देने और अंग्रेजी दवाओं के बदले हर्बल दवाएं खरीदने के लिए प्रेरित करने की शिकायतों पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम के उल्लंघन के तहत दो महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं (एएनएम) को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।
लेकिन इसी राजनांदगांव जिले की सरजमीं पर जब शासकीय जिला चिकित्सालय में वर्ष 2024-25 के दौरान हुए करीब 30 लाख रुपये के बहुचर्चित फर्नीचर खरीदी घोटाले की बात आती है, तो यही कड़क कानून और प्रशासनिक हंटर लकवाग्रस्त हो जाता है। ₹1000-₹2000 की हेराफेरी या कमीशनखोरी पर एएनएम कर्मचारियों को नौकरी से बेदखल करने वाला यह तंत्र, 30 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता और पिछले 5 सालों के घोटालों के सबूतों को रिकॉर्ड रूम में जानबूझकर ‘जलमग्न’ करने की साज़िश रचने वाले अधिकारी, कर्मचारियों के आगे पूरी तरह साष्टांग दंडवत नजर आता है।

Health reporter@राजनांदगांव: प्रशासन की भूमिका पर सीधा सवाल; फर्नीचर घोटाला ऑन-रिकॉर्ड उजागर, 07 महीने से जांच पेंडिंग, संलिप्त कर्मचारियों को प्रमोशन की मलाई, पर जिला प्रमुख मौन…

छोटे कर्मचारियों पर ‘शेर’ बनने वाला प्रशासन, बड़े घोटालेबाजों का बना ‘गुलाम’
आयुष्मान आरोग्य मंदिर अचानकपुर (भाठापारा) में पदस्थ ग्रामीण स्वास्थ्य संयोजक और भेड़ीकला में पदस्थ महिला कर्मचारी के खिलाफ शिकायतें मिलने पर जांच समितियां गठित की गईं, साक्ष्य जुटाए गए और उन्हें तत्काल निलंबित कर दिया गया। निश्चित रूप से नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सवाल जिला प्रशासन की नीयत पर उठता है।
जब जिला अस्पताल के दागी अधिकारी, कर्मचारियों के खिलाफ फरवरी 2026 में ही दस्तावेजी सबूतों के साथ लिखित शिकायत दर्ज कराई गई थी, जिसका मामला खुद छत्तीसगढ़ विधानसभा के सदन तक में गूंजा, तो उनके खिलाफ निलंबन की कार्रवाई क्यों नहीं हुई? 07 महीने बीत जाने के बाद भी आज अक्टूबर 2026 तक उन महा-घोटालेबाजों पर कोई कार्रवाई न होना यह साफ जाहिर करता है कि जिला प्रशासन का यह कानून अंधा ही नहीं, बल्कि चुनिंदा तौर पर बहरा और रसूखदारों का गुलाम भी है।

साज़िश की क्रोनोलॉजी: सबूतों को ‘पानी’ में बहाया, इनाम में मिला प्रमोशन का जैकपॉट
इस समूचे खेल का जो दस्तावेजी क्रम सामने आया है, वह किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है। जब जागरूक शिकायतकर्ता ने वर्ष 2024-25 की फर्नीचर खरीदी के ऑन-रिकॉर्ड दस्तावेज निकालकर 30 लाख रुपये के फर्जीवाड़े को बेनकाब कर दिया, तो भ्रष्ट सिंडिकेट में खलबली मच गई। उन्हें डर था कि यदि पिछले वर्षों (2021 से 2024 तक) का रिकॉर्ड भी सामने आ गया तो फर्नीचर कांड पार्ट-2 का भंडाफोड़ हो जाएगा।
इस घबराहट में, जब आरटीआई के तहत पुराना रिकॉर्ड मांगा गया, तो अस्पताल प्रबंधन ने ‘भूतल में जलभराव के कारण सारे दस्तावेज नष्ट होने’ की मनगढ़ंत कहानी गढ़ दी। खुद सिविल सर्जन ने पत्र जारी कर इसे ‘प्राकृतिक आपदा’ बताते हुए सरकारी रिकॉर्ड के नष्ट होने को क्लीन चिट दे दी। और इस पूरी जलमग्न साज़िश के सूत्रधार कर्मचारियों को सस्पेंड करने के बजाय, गोपनीय चरित्रावली से सारे दाग धोकर प्रमोशन दे दिया गया।

जिला प्रशासन और सीएमएचओ के दोहरे मापदंड

जिला प्रशासन को यह जवाब देना होगा कि छोटे एएनएम कार्यकर्ताओं के खिलाफ जांच के लिए तो उनकी समितियां रातों-रात रिपोर्ट सौंप देती हैं और निलंबन का आदेश जारी हो जाता है, लेकिन फर्नीचर कांड के लिए गठित की गई पांच सदस्यीय जांच टीम पिछले 07 महीनों से रिपोर्ट क्यों दबा कर बैठी है? क्या जिला प्रशासन की नाक के नीचे सरकारी रिकॉर्ड रूम में जानबूझकर पानी भर देना और टेंडर फाइलों को नष्ट कर देना कोई अपराध नहीं है? जांच लंबित होने के बावजूद कर्मचारी को दूसरे जिले में ‘सेफ एग्जिट’ प्लान के तहत प्रमोशन और ट्रांसफर की हरी झंडी कैसे मिल गई? क्या कलेक्ट्रेट का पूरा शीर्ष नेतृत्व इस 30 लाख की मलाई के सिंडिकेट में हिस्सेदार है, इसीलिए इस फाइल को हाथ लगाने में सबके हाथ कांप रहे हैं?

लोकतंत्र पर हावी हुआ ‘लूटतंत्र’, अब सीधे सरकार से सवाल
राजनांदगांव जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग की यह अंतहीन ढिटाई और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई सूबे की सरकार की ‘सुशासन’ के दावों के गाल पर एक करारा तमाचा है। जिला अस्पताल में गरीब जनता आज भी बुनियादी दवाओं, बेड और स्ट्रेचर के लिए तड़प रही है, छोटे कर्मचारियों को मामूली गलतियों पर सूली पर चढ़ाया जा रहा है, और लाखों की हेराफेरी करने वाले बड़े मगरमच्छ कलेक्ट्रेट और मंत्रालय की छत्रछाया में मलाईदार कुर्सियों का आनंद ले रहे हैं।
इस खुली प्रशासनिक तानाशाही के खिलाफ जनता में रोष साफ दिखाई पड़ रहा है। मामले में संलिप्त अधिकारी और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की जा रही है।

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