एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
राजनांदगांव जिला आबकारी विभाग में सूचना का अधिकार अधिनियम का जमकर मजाक बनाया जा रहा है। यहां अफसर से ज्यादा बाबू की धाक जमी हुई है। जो अपनी मनमर्जी चलाने में लगे हुए हैं। आरटीआई के तहत दाखिल किए गए एक भी आवेदन पर जन सूचना अधिकारी की ओर से पूर्ण जानकारी नहीं दी जा रही है। शिकायत करने पर अधिकारी पक्षपात करने में लगे हुए हैं। सीधे कह तो आवेदन पर सुनवाई न्याय संगत नहीं हो रही है।
सरकारी डॉक्यूमेंट को बता रहे हैं निजी और गोपनीय
आबकारी दफ्तर के अधिकारी और कर्मचारी सूचना का अधिकार के तहत जानकारी देने से बचने के लिए बहाने बाजी करने में लगे हुए हैं। आवेदक को किसी भी नियम का हवाला देकर जानकारी देने से मना कर दिया जा रहा है। सबसे प्रमुख बहाना है सरकारी डॉक्यूमेंट को निजी और गोपनीय बताना।
बीते दिनों डिपार्मेंट में जनहित से जुड़े विभिन्न जानकारी के लिए सूचना का अधिकार के तहत आवेदन देकर दस्तावेजों की मांग की गई। इस पर जन सूचना अधिकारी द्वारा न्याय संगत जानकारी देने से बचा जा रहा है। पंजीकृत डाक के बजाय व्हाट्सएप में पत्र भेजकर कर्मचारी लोक हितैषी कानून का माखौल उड़ा रहे है। जिन जानकारियों को सामान्य तौर पर प्रदर्शित करना चाहिए उन दस्तावेजों को निजी और गोपनीय बताकर जानकारी देने से बचा जा रहा है। जबकि सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत यह साफ किया गया है कि ऐसी जानकारी जो विधानसभा और संसद में दी जा सकती है वह गोपनीय नहीं है।
सख्ती से पालन करने के निर्देश पर अधिकारी कर रहे मनमानी
सूचना आयोग द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम का सख्ती से पालन करने के लिए सभी शासकीय कार्यालय को निर्देश दिया गया है। जानकारी के लिए समय-समय पर कार्यशाला का आयोजन किया जाता है। लेकिन अधिकारी अपनी ही मनमानी करने में लगे हुए हैं। राजनांदगांव जिला मुख्यालय में स्थित अधिकांश सरकारी कार्यालय में बाहर जन सूचना अधिकारी और प्रथम अपील अधिकारी के संबंध में सूचना पटल भी चस्पा नहीं किया गया है। जबकि यह सबसे प्राथमिक कार्य है। कई शासकीय कार्यालय में रसीद की उपलब्धता नहीं है ऐसे में आवेदकों को बेवजह ही परेशान होना पड़ता है। पत्राचार भी सही समय पर नहीं किए जाते और पूछने पर तरह-तरह की बहाने बाजी की जाती है। शासकीय कार्यों में पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से सूचना का अधिकार अधिनियम लागू किया गया है। अपने फायदे के लिए अधिकारी कर्मचारियों को इसका मजाक बनाने की खुली छूट नहीं मिलनी चाहिए। शासन प्रशासन को इस ओर ध्यान देने की जरूरत है।
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