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लाला कर्णकान्त श्रीवास्तव

एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । रायपुर

विधानसभा चुनाव 2023 के लिए दूसरे व अंतिम चरण का मतदान 17 नवम्बर को किया जाएगा। इस बार सत्ता की चाह में किसानों को रिझाने राजनीतिक दलों ने कर्ज माफी और धान के बोनस जैसी बड़ी घोषणाएं की है, लेकिन इसकी शोर में किसानों के दूसरे मुद्दे गौण हो गए हैं। जबकि छत्तीसगढ़ में खरीफ के धान के अलावा रबी और उद्यानिकी की फसले भी बड़े रकबे में होती है। लेकिन इस ओर किसी का ध्यान ही नहीं जा रहा है। इसके अलावा सिंचाई सुविधा का विस्तारीकरण भी अपने आप में गंभीर मसला है, प्रदेश में कृषि का एक बहुत बड़ा भाग असिंचित एरिया में आता है, यहां फसलों की बोनी केवल बारिश पर ही निर्भर करती है। लेकिन इस बारे में किसी को सोचने तक की फुर्सत नहीं है। यहां तक कि राजनीतिक दलों के घोषणा पत्र इसका जिक्र तक नहीं किया है। दलहन तिलहन की खेती के साथ समर्थन मूल्य, टमाटर और अनाज को भंडारित करके रखने के लिए स्टोरेज और प्रोसेसिंग प्लांट जैसी आवश्यकताओं से राजनीतिक दलों ने किनारा कर लिया है।

विधानसभा चुनाव के लिए राजनीतिक दलों ने अपनी घोषणा पत्र जारी कर दिया है। राजनीतिक दलों ने घोषणा पत्र के माध्यम से किसानों को रिझाने का प्रयास किया है। घोषणाओं में प्रमुख रूप से कर्ज माफी और अधिक से अधिक समर्थन मूल्य शामिल है। लेकिन कृषि और किसानों से जुड़े किसी और मुद्दे को चुनावी घोषणा पत्र में शामिल नहीं किया गया है।

फल और सब्जियों के लिए इनके पास कोई प्लान नहीं

प्रदेश में अच्छे खासे रकबे में उद्यानिकी फसलों की खेती होती है। इसमें सर्वाधिक रकबा सब्जियों की है। सब्जियों की खेती से ज्यादा लाभ के कारण बड़ी संख्या में छोटे किसान भी इस कार्य में लगे हैं। लोकल बाडिय़ों से सब्जियों की पैदावार के लिहाज से जनवरी-फरवरी पीक सीजन होता है। इस दौरान बंपर आवक से किसानों को सब्जियों के दाम नहीं मिलता। यही हाल केला-पपीता उत्पादक किसानों का होता है। रबी में भी फल और सब्जियों की खेती होती है, लेकिन इस ओर किसी भी पार्टी ने ध्यान नहीं दिया।

तेजी से घट रहा दलहन- तिलहन का रकबा

पिछले कुछ वर्षों से प्रदेश में दलहन व तिलहन का रकबा तेजी से घटता जा रहा है। दलहन व तिलहन की पर्याप्त खेती नहीं होने के कारण बाजार को बाहरी आवक पर निर्भर रहना पड़ता है। दलहन तिलहन की खेती पर फोकस कर इससे निजात दिलाई जा सकती है, लेकिन राजनीतिक पार्टियों के पास इसके लिए कोई प्लान नहीं है।

रबी के धान और गेहूं की खरीदी की व्यवस्था नहीं

प्रदेश में अधिकांश कृषि रकबे में रबी की फसल होती है। इसमें धान और गेहूं की फसल शामिल है। इन दोनों फसलों की समर्थन मूल्य पर खरीदी अथवा बिक्री के लिए सुव्यस्थित बाजार नहीं है। ऐसे में किसानों को रबी का धान खरीफ के समर्थन मूल्य से करीब आधी कीमत पर बेचना पड़ता है। यही स्थिति गेहूं की भी है। ऐसे में रबी में धान और गेहूं की खेती किसानों के लिए घाटे का सौंदा साबित होता है। खरीफ के धान की तरह रबी में भी धान और गेहूं की समर्थन मूल्य पर खरीदी की मांग लगातार उठती रही है, लेकिन राजनीतिक दलों ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

डेयरी और फिशरीज मास्टर प्लान से गायब

डेयरी व फिशरीज भी कृषि का हिस्सा है, लेकिन इन्हें बढ़ावा देने के लिए अब तक कुछ भी नहीं किया जा सका है। मौजूदा घोषणा पत्र में भी राजनीतिक दलों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। इस ओर ध्यान नहीं दिए जाने के कारण प्रदेश में दूध उत्पादन की कमी है। जबकि खपत इससे तीन से चार गुना ज्यादा है। यही हाल मत्स्य पालन का है। मत्स्य पालन को कृषि का दर्जा दिया गया है, लेकिन इसको बढ़ावा देने अब तक खास नहीं किया जा सका है।

कोल्ड स्टोरेज की है जरूर

प्रदेश में टमाटर की भी बंपर पैदावार होती है। पीक सीजन में मंडियों में यह टमाटर कोई 5 रुपए किलो में खरीदने को तैयार नहीं था। वहीं जून में इसकी कीमत 200 रुपए किलो तक पहुंच गई थी। पीक सीजन में कई बार स्थिति यह होती है कि दाम नहीं मिलने से टमाटर सड़कों पर फेंकना पड़ता है। कोल्ड स्टोरेट व प्रोसेसिंग प्लांट के माध्यम से किसानों को इस स्थिति से बचाया जा सकता है, लेकिन राजनीतिक दलों ने घोषणा पत्र में इन्हें शामिल नहीं किया है।

मतदाताओं से अपील- अपने मत का करें सदुपयोग

चुनावी रण में पानी की तरह पैसा बहाने वाली राजनीतिक पार्टियां चुनाव जीतने के बाद बुनियादी सेवाओं और सुविधाओं के विस्तार के समय मुट्ठी बंद कर लेती है। जिससे लोगों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। इसलिए मतदाताओं से अपील है कि किसी पार्टी विशेष के प्रलोभन में ना आते हुए अपने मत का सही और सटीक उपयोग करें, जिससे आने वाले समय में आपके और आपके क्षेत्र का विकास हो सके। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के 90 में से 20 विधानसभा सीटों पर बीते 7 नवंबर को मतदान हो चुका है शेष सीटों पर आगामी 17 नवंबर को मतदान होना है।
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