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एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव

शासकीय जिला चिकित्सालय राजनांदगांव में वर्ष 2024-25 के दौरान हुए करीब 30 लाख रुपये के फर्नीचर खरीदी फर्जीवाड़े की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, वैसे-वैसे इसमें शामिल सफेदपोश चेहरों और प्रशासनिक अड़ंगों का एक ऐसा सनसनखेज सिंडिकेट सामने आ रहा है जिसने समूचे छत्तीसगढ़ के प्रशासनिक हलके को हिलाकर रख दिया है। इस महाघोटाले की कड़ियां सिर्फ अस्पताल के एक छोटे बाबू तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें तत्कालीन सिविल सर्जन सह अस्पताल अधीक्षक से लेकर जिला प्रशासन के कोषालय अधिकारी तक सीधे तौर पर कटघरे में खड़े नजर आ रहे हैं। इस प्रशासनिक अराजकता की पराकाष्ठा देखिए कि एक तरफ इस पूरे मामले की गूंज छत्तीसगढ़ विधानसभा सत्र में सुनाई दी और जांच आज भी पेंडिंग है, तो दूसरी तरफ नियमों का सरेआम कत्ल करते हुए इस घोटाले के संलिप्त किरदार को लेखापाल से प्रमोट कर सीधे ‘मुख्य लिपिक’ की मलाईदार कुर्सी सौंप दी गई है।

Health reporter@राजनांदगांव: सिस्टम की बेशर्मी; अस्पताल का 30 लाख का फर्नीचर घोटाला अब ‘फाइल बंद, मामला दफन’ की ओर, दागी की कुर्सी बरकरार, मौन बैठे जिम्मेदार…

 

ऊपर से नीचे तक जुड़ा है सिंडिकेट, ये बड़े नाम हैं घेरे में

यदि इस 30 लाख रुपये के घोटाले के वित्तीय और प्रशासनिक प्रवाह का बारीकी से आकलन किया जाए, तो स्वतंत्र जांच के रडार पर अस्पताल प्रबंधन और जिला प्रशासन के ये बड़े पद सीधे तौर पर आ रहे हैं:

तत्कालीन सिविल सर्जन सह अस्पताल अधीक्षक: अस्पताल के सर्वोच्च आहरण एवं संवितरण अधिकारी (DDO) होने के नाते बिना आवश्यक ‘प्रशासकीय स्वीकृति’ के वित्तीय सीमा से बाहर जाकर बिलों को पास करना और फिर नियम विरुद्ध संशोधित आदेश जारी करना इन्हें कटघरे में खड़ा करता है।

जिला कोषालय अधिकारी और स्टाफ: सरकारी खजाने से बिना वैध दस्तावेजों और बिना वित्तीय नियमों की स्क्रूटनी किए अस्पताल के इन संदिग्ध बिलों को हरी झंडी दिखाना कोषालय की बेहद गंभीर लापरवाही को साबित करता है। निविदा प्रक्रिया से बचने के लिए बिलों को टुकड़ों में बांटने के खेल को कोषालय ने आखिर क्यों नहीं पकड़ा?

अस्पताल का लेखा और स्टोर प्रभाग: क्रय नियमों की धज्जियां उड़ाने, टेंडर प्रक्रिया में हेरफेर करने और फर्जी वाउचर तैयार करने में स्टोर कस्टोडियन और लेखा प्रभाग के तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारी व कर्मचारी इस भ्रष्टाचार के मुख्य सूत्रधार हैं।

कागजी जांच समिति के सदस्य: जिला प्रशासन द्वारा गठित की गई पांच सदस्यीय जांच टीम भी अब संदेह के घेरे में है, जिसने महीनों से ‘भौतिक सत्यापन’ की रिपोर्ट को दबाकर रखा ताकि घोटालेबाजों को सुरक्षित रास्ता मिल सके।

गोपनीय चरित्रावली (CR) से खिलवाड़ कर दागी को मिला ‘प्रमोशन’ का बंपर इनाम
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रशासनिक ‘ब्लंडर’ यह है कि जिस कर्मचारी पर लेखापाल रहते हुए इस वित्तीय हेराफेरी को अंजाम देने के गंभीर आरोप हैं, उसकी गोपनीय चरित्रावली (CR – Confidential Report) के साथ ऐसा जादुई खेल खेला गया कि उसके सारे दाग रातों-रात गायब कर दिए गए। छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण तथा अपील) नियम, 1966 के तहत यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ कोई विभागीय या वित्तीय जांच लंबित हो, तो उसकी पदोन्नति को ‘सीलबंद लिफाफे’ में डाल दिया जाता है। लेकिन यहाँ नियमों को ठेंगा दिखाकर दागी कर्मचारी को ‘मुख्य लिपिक’ की सबसे रसूखदार कुर्सी सौंप दी गई। अब वह मुख्य लिपिक की हैसियत से अस्पताल की पूरी स्थापना शाखा, लेखाशाखा, रोकड़बही और पेंशन शाखा का सर्वेसर्वा बन बैठा है और खुद अपने ही खिलाफ चल रही जांच की फाइलों और सबूतों को मिटाने का पावर पा चुका है।

लूटतंत्र के आगे पंगु हुआ लोकतंत्र, जनता मांग रही हिसाब
सदन से लेकर सड़क तक इस महाघोटाले पर फैला सन्नाटा यह चीख-चीख कर कह रहा है कि राजनांदगांव जिला अस्पताल में नियम-कानूनों का नहीं, बल्कि एक संगठित ‘लूटतंत्र’ का राज चल रहा है। विधानसभा में कड़ी कार्रवाई का आश्वासन देने वाली सरकार की साख को यह भ्रष्ट सिंडिकेट सीधे चुनौती दे रहा है। जागरूक नागरिक और शिकायतकर्ता मामले की जांच स्वतंत्र एजेंसी से कराने की मांग कर रहें हैं।

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