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एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव

शासकीय जिला चिकित्सालय राजनांदगांव में वर्ष 2024-25 में हुए करीब 30 लाख रुपये के बहुचर्चित ‘फर्नीचर खरीदी फर्जीवाड़े’ को लेकर हर बीतते दिन के साथ प्रशासनिक बेशर्मी की नई परतें खुल रही हैं। मीडिया द्वारा लगातार किए जा रहे तीखे खुलासों और जन-आक्रोश के बावजूद, समूचा प्रशासनिक अमला शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सिर छिपाए बैठा है। नियम-कानूनों को ताक पर रखकर दागी कर्मचारी को दोबारा मलाईदार प्रभार सौंपने वाले संशोधित आदेश को जारी हुए कई दिन बीत चुके है, लेकिन आज तक न तो उस आदेश को निरस्त किया गया और न ही आरोपियों पर कोई आंच आई। पूरा मामला अब सुनियोजित तरीके से ‘फाइल बंद, मामला दफन’ की ओर बढ़ता नजर आ रहा है।

Health reporter@राजनांदगांव: भ्रष्टाचार पर सिस्टम की ‘मूक सहमति’, अस्पताल के 30 लाख के फर्नीचर घोटाले पर हर स्तर पर सन्नाटा, विधानसभा से लेकर कलेक्ट्रेट तक मूकदर्शक, दागी उड़ा रहे नियमों की धज्जियाँ…

 

दागी की छत्रछाया में सुरक्षित हैं घोटाले के सबूत

अस्पताल प्रशासन का यह रवैया साफ जाहिर करता है कि यहाँ नियमों की धज्जियां उड़ाना कोई भूल नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वित्तीय नियमों की मूल भावना कहती है कि जांच के दौरान संदिग्ध व्यक्ति को संबंधित फाइलों और प्रभाग से दूर रखा जाए ताकि वह सबूतों के साथ छेड़छाड़ न कर सके। लेकिन राजनांदगांव जिला अस्पताल में आरोपी ही खुद अपनी जांच वाली फाइलों का कस्टोडियन बनकर बैठा है। जिस फर्नीचर और स्टेशनरी प्रभाग की खरीदी को लेकर विधानसभा सत्र तक में उंगलियां उठी थीं, उसी प्रभाग की चाबी फिर से दागी के हवाले कर देना यह साबित करता है कि ऊपरी स्तर पर बैठे रसूखदार अधिकारी खुद इस मामले की निष्पक्ष जांच नहीं चाहते।

कागजी साबित हुई जांच कमेटी, सिर्फ समय काटने का खेल
जिला प्रशासन द्वारा गठित की गई पांच सदस्यीय जांच टीम की असलियत अब जनता के सामने पूरी तरह बेनकाब हो चुकी है। वरिष्ठ अधिकारियों, कार्यालयीन कर्मचारियों और फार्मासिस्ट को शामिल कर बनाई गई इस कमेटी का एकमात्र मकसद केवल वक्त काटना और मामले की तपिश को धीमा करना था। महीनों बीत जाने के बाद भी ‘भौतिक सत्यापन’ की रिपोर्ट का अता-पता न होना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि यह कमेटी केवल एक ढाल थी, जिसका इस्तेमाल घोटालेबाजों को बचाने के लिए किया गया। जब जांच करने वाले ही मौन साध लें, तो इसे प्रशासनिक पंगुता कहें या भ्रष्टाचार में बराबर की हिस्सेदारी?

सदन से लेकर सड़क तक जनता के साथ धोखा

विधानसभा सत्र के दौरान प्रदेश की जनता के सामने बड़ी-बड़ी बातें की गई थीं और निष्पक्ष कार्रवाई का ढिंढोरा पीटा गया था। लेकिन सदन की कार्यवाही स्थगित होते ही नौकरशाही ने पूरे मामले को रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया। कलेक्ट्रेट से लेकर राजधानी के आला अधिकारियों की यह चुप्पी राजनांदगांव की जनता के साथ एक खुला धोखा है। अस्पताल में आज भी दवाइयों की कमी है, गरीब मरीज सुविधाओं के लिए भटक रहे हैं, लेकिन शासन के पास भ्रष्ट सिंडिकेट पर नकेल कसने की फुर्सत नहीं है।

लूटतंत्र के आगे सरेंडर कर चुका है लोकतंत्र

राजनांदगांव जिला अस्पताल का यह महाघोटाला और उसके बाद पसरा यह अंतहीन सन्नाटा चीख-चीख कर गवाही दे रहा है कि यहाँ का तंत्र पूरी तरह से सड़ चुका है। जब खुली अनियमितता, बिना प्रशासनिक स्वीकृति के लाखों के वारे-न्यारे और नियम विरुद्ध संशोधित आदेशों पर भी कोई हथौड़ा नहीं चलता, तो यह मान लिया जाना चाहिए कि अस्पताल में ‘लूटतंत्र’ के आगे लोकतंत्र घुटने टेक चुका है। शासन-प्रशासन की यह चुप्पी आने वाले दिनों में नए और बड़े घोटालों का रास्ता साफ कर रही है, जिसका खामियाजा सिर्फ और सिर्फ यहां आने वाले गरीब मरीजों को भुगतना पड़ेगा।

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