एक्स रिपोर्टर न्यूज । राजनांदगांव
सूचना का अधिकार अधिनियम, जिसे भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता का सबसे बड़ा हथियार माना गया था, आज राजनांदगांव में सरकारी तंत्र की तानाशाही की भेंट चढ़ चुका है। जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) ने न केवल प्रशासनिक मर्यादाओं को ताक पर रख दिया है, बल्कि प्रथम अपीलीय अधिकारी के रूप में अपनी भूमिका को ‘भ्रष्टाचार के कवच’ में तब्दील कर दिया है।
कुर्सी की हनक या भ्रष्टाचार से सांठगांठ!
हैरानी की बात है कि जिस अधिकारी को निष्पक्ष होकर सूचना न देने वाले लोक सूचना अधिकारियों पर नकेल कसनी चाहिए थी, वही सीएमएचओ आज खुद एक ‘बचाव पक्ष’ के वकील की तरह काम कर रहे हैं। RTI आवेदकों का आरोप है कि सीएमएचओ कार्यालय में होने वाली प्रथम अपील की सुनवाई महज एक ढोंग है। यहाँ न्याय नहीं, बल्कि सूचनाओं को दबाने की ‘सेटिंग’ होती है।
आंकड़े गवाह हैं कि सीएमएचओ की मेज पर आने वाली अधिकांश अपीलों को या तो बिना ठोस आधार के खारिज कर दिया जाता है या फिर ऐसी अधूरी जानकारी दी जाती है जिसका कोई मोल नहीं होता। क्या यह माना जाए कि स्वास्थ्य विभाग में लाखों के वारे-न्यारे हो रहे हैं, जिन्हें छिपाने के लिए साहब खुद ढाल बनकर खड़े हैं?
अपील नहीं, मानसिक प्रताड़ना का केंद्र
जब कोई जागरूक नागरिक भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए RTI लगाता है, तो उसे उम्मीद होती है कि प्रथम अपीलीय अधिकारी उसकी बात सुनेगा। लेकिन यहाँ की हकीकत उलट है। आवेदकों का कहना है कि सुनवाई के दौरान सीएमएचओ का व्यवहार पक्षपातपूर्ण रहता है। सूचना देने के बजाय आवेदक को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। जन सूचना अधिकारी, जो अक्सर इनके अधीनस्थ होते हैं, उन्हें सजा देने के बजाय साहब उन्हें अपनी छत्रछाया में संरक्षण देते हैं।
मौन प्रशासन और दम तोड़ती पारदर्शिता
यह जानते हुए भी कि RTI कानून में देरी या गलत जानकारी देने पर दंड का प्रावधान है, सीएमएचओ के माथे पर शिकन तक नहीं आती। ऐसा लगता है जैसे उन्हें शासन-प्रशासन का कोई डर ही नहीं है। क्या स्वास्थ्य विभाग में दवा खरीदी, नियुक्तियों और टेंडरों के नाम पर जो बंदरबांट हुई है, उसकी जड़ें सीएमएचओ के दफ्तर तक फैली हुई हैं? यदि नहीं, तो सूचना सार्वजनिक करने से इतनी घबराहट क्यों?
जनता का आक्रोश, रक्षक ही बने भक्षक
सीएमएचओ के इस तानाशाही रवैये से जिले के आरटीआई कार्यकर्ताओं और आम जनता में भारी रोष है। अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या एक पक्षपाती अधिकारी को अपीलीय पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार है? अगर रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो जनता न्याय की गुहार कहाँ लगाए?
सामाजिक संगठनों ने अब इस मामले को राज्य सूचना आयोग और शासन के उच्च अधिकारियों तक ले जाने का मन बना लिया है। मांग की जा रही है कि सीएमएचओ के कार्यकाल में निपटाए गए सभी RTI आवेदनों की उच्च स्तरीय जांच हो और उनके द्वारा जानबूझकर छिपाई गई जानकारियों को सार्वजनिक किया जाए।
जनता के अधिकारों पर सीधा हमला
सीएमएचओ का यह पक्षपातपूर्ण रवैया लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और जनता के अधिकारों पर सीधा हमला है। यह कुर्सी की हनक नहीं, बल्कि व्यवस्था की सड़न है। अगर समय रहते इन ‘सफेदपोश संरक्षकों’ पर लगाम नहीं कसी गई, तो सूचना का अधिकार कानून केवल कागजों तक ही सिमट कर रह जाएगा।
सीएमएचओ का यह पक्षपातपूर्ण रवैया लोकतंत्र के चौथे स्तंभ और जनता के अधिकारों पर सीधा हमला है। यह कुर्सी की हनक नहीं, बल्कि व्यवस्था की सड़न है। अगर समय रहते इन ‘सफेदपोश संरक्षकों’ पर लगाम नहीं कसी गई, तो सूचना का अधिकार कानून केवल कागजों तक ही सिमट कर रह जाएगा।
*******


