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एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI), जिसे लोकतंत्र में भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार माना गया था, जिले के स्वास्थ्य विभाग में दम तोड़ रहा है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय और जिला अस्पताल प्रबंधन ने मिलकर पारदर्शिता की धज्जियां उड़ाने का बीड़ा उठा लिया है। आलम यह है कि सरकारी पैसे से खरीदी गई दवाइयां हों, नियुक्तियां हों या निर्माण कार्य—हर उस फाइल को ‘निजी और गोपनीय’ बताकर जानकारी देने से इनकार किया जा रहा है, जिसमें भ्रष्टाचार की बू आ रही है।
सरकारी दस्तावेज अब ‘पर्सनल प्रॉपर्टी’
हैरानी की बात है कि जो दस्तावेज सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं, उन्हें सरकारी अधिकारी अपनी ‘निजी जागीर’ समझ रहे हैं। जब भी कोई आरटीआई कार्यकर्ता या जागरूक नागरिक भ्रष्टाचार, घटिया सप्लाई, वित्तीय अनियमितताओं और कर्मचारियों की नियुक्ति से संबंधित दस्तावेज मांगता है, तो प्रबंधन की ओर से रटा-रटाया जवाब आता है— “यह जानकारी तृतीय पक्ष से संबंधित है और गोपनीय है।” सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी खजाने से होने वाला खर्च भी CMHO और अस्पताल प्रबंधन का निजी मामला है? क्या जनता को यह जानने का हक नहीं कि उनके टैक्स का पैसा किस अधिकारी की जेब में जा रहा है?
काली करतूतों को छिपाने का ‘गोपनीय’ खेल
सूत्रों की मानें तो स्वास्थ्य विभाग के भीतर सामानों की खरीदी से लेकर आउटसोर्सिंग तक में भारी बंदरबांट हुई है। अधिकारियों को डर है कि अगर दस्तावेज बाहर आए, तो उनकी कुर्सी और साख दोनों मिट्टी में मिल जाएगी। यही कारण है कि आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारियों को महीनों तक लटकाया जाता है और अंततः नियम-कानूनों को ताक पर रखकर आवेदन निरस्त कर दिए जाते हैं। यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि सीधे तौर पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की साजिश है।
कुंभकर्णी नींद में जिला प्रशासन
जिले में सूचना के अधिकार का इस कदर अपमान हो रहा है, लेकिन जिला प्रशासन की चुप्पी सबसे ज्यादा परेशान करने वाली है। अपीलीय अधिकारियों के चक्कर काटते-काटते आवेदक थक चुके हैं, मगर प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही। क्या जिला प्रशासन भी इस ‘मौन सहमति’ का हिस्सा है? आखिर क्यों इन लापरवाह और भ्रष्ट अधिकारियों पर नकेल नहीं कसी जा रही?
बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी रोष
अधिकारियों के इस तानाशाही रवैये से शहर के बुद्धिजीवियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं में भारी रोष है। उनका कहना है कि अगर स्वास्थ्य विभाग इतना ही पाक-साफ है, तो जानकारी देने में डर कैसा? गोपनीयता का यह पर्दा असल में उन काली करतूतों को छिपाने की कोशिश है, जो उजागर हुईं तो कई बड़े चेहरों को जेल की हवा खानी पड़ सकती है। CMHO और जिला अस्पताल प्रबंधन यह न भूलें कि वे लोकतंत्र के सेवक हैं, मालिक नहीं। आरटीआई की धज्जियां उड़ाकर वे कुछ समय के लिए अपनी खाल तो बचा सकते हैं, लेकिन जनता की अदालत में उनका हिसाब होना तय है। अगर प्रशासन ने जल्द ही इन ‘सफेदपोश भ्रष्टाचारियों’ पर कार्रवाई नहीं की, तो मामले की शिकायत उच्च अधिकारियों से की जाएगी।
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