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राजनांदगांव 01 जून 2023। मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका या किसान किताब की कृषक के जीवन में महत्ता को देखते हुए इसे एक नया सम्मान जनक नाम देने का आव्हान आम नागरिकों से किया है। राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका या किसान किताब के नए नामकरण के लिए प्रतिभागियों से सुझाव 30 जून 2023 तक वेबसाईट https://revenue.cg.nic.in/rinpustika पर आमंत्रित की गई है। प्रतिभागी निर्धारित तिथि तक वेबसाईट में अपने मोबाईल नंबर को रजिस्टर कर अपनी एक प्रविष्टि अपलोड कर सकते है। प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागी को एक लाख रूपए का पुरस्कार दिया जाएगा। ज्ञातव्य हो कि मुख्यमंत्री श्री भूपेश बघेल द्वारा जिला बलौदाबाजार-भाटापारा के विधानसभा क्षेत्र ग्राम कड़ार में आयोजित भेंट मुलाकात के दौरान भू-अधिकार एवं ऋण पुस्तिका या किसान किताब की कृषक के जीवन में महत्ता को दृष्टिगत रखते हुये इसे एक नया सम्मान जनक नाम देने का आव्हान आम जनता से किया है।
राज्य में प्रत्येक किसान मालगुजारी के समय से परंपरागत रूप से अपने स्वामित्व की भूमि का लेखा-जोखा एक पुस्तिका के रूप में धारित करता रहा है। मालगुजारीकाल में बैल जोड़ी के चित्र वाली एक लाल रंग की पुस्तिका, जिसे असली रैयतवारी रसीद बही कहा जाता था। मालगुजारों द्वारा कृषकों को दी जाती थी। कालांतर में इस पुस्तिका को भू-राजस्व सहिता में कानूनी रूप दिया गया। भू-राजस्व संहिता के प्रभावशील होने के पश्चात वर्ष 1972-73 में इस पुस्तिका का नामकरण भू अधिकार एवं ऋण पुस्तिका किया गया। भू अधिकार एवं ऋण पुस्तिका में कृषक द्वारा धारित विभिन्न धारणाधिकार की भूमि एवं उनके द्वारा भुगतान किये गये भू राजस्व, उनके द्वारा लिए गये अल्प एवं दीर्घकालीन ऋणों के विवरण का इन्द्राज किया जाता है। इसके अतिरिक्त भूमि के अंतरणों की प्रविष्टियों को भी इसमें दर्ज किया जाता रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के पश्चात वर्ष 2003 में ऋण पुस्तिका का नाम किसान किताब किया गया। लेकिन इसके उद्देश्यों एवं उपयोग में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। किसान किताब में किसान द्वारा धारित समस्त भूमि वैसे ही प्रतिबिंबित होती है, जैसे वह भू-अभिलेखों में है। किसान किताब प्रत्येक भू-स्वामी व भू-धारी कृषक के जीवन का एक अभिन्न अंग रहा है। कृषक के समस्त कृषकीय एवं वित्तीय कार्य की अधिकारिक पुष्टि का स्त्रोत यह छोटी सी पुस्तिका ही रही है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह कृषक की अस्मिता से सीधे संबंधित रही है।

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