एक्स रिपोर्टर न्यूज़ । राजनांदगांव
शासकीय जिला चिकित्सालय राजनांदगांव में वर्ष 2024-25 के दौरान हुए करीब 30 लाख रुपये के फर्नीचर खरीदी घोटाले और उसके बाद शुरू हुए नियम विरुद्ध प्रशासनिक संरक्षण के खेल को लेकर एक के बाद एक कई बड़े खुलासे हो चुके हैं। समूचे सिंडिकेट का कच्चा चिट्ठा दस्तावेजों के साथ जनता के सामने आ चुका है, लेकिन इस पूरे मामले में सबसे शर्मनाक और हैरान करने वाली हकीकत यह है कि इतने बड़े गंभीर खुलासे के बाद भी आज दिनांक तक शासन-प्रशासन स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। पूरा प्रशासनिक अमला मानो लकवाग्रस्त हो चुका है और भ्रष्टाचारियों के आगे पूरी तरह नतमस्तक नजर आ रहा है।
जांच को जेब में रखकर शान से मुख्य लिपिक की कुर्सी पर जमा है दागी
इस पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रशासनिक ‘ब्लंडर’ यह है कि जिस कर्मचारी पर लेखापाल रहते हुए बिना किसी वैध ‘प्रशासकीय स्वीकृति’ के वित्तीय नियमों की धज्जियां उड़ाकर लाखों के बिल पास कराने का गंभीर आरोप है, उसे सजा देने के बजाय पदोन्नति देकर ‘मुख्य लिपिक’ बना दिया गया।
छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियम को तार-तार करते हुए विभागीय पदोन्नति समिति के सामने इस कर्मचारी की गोपनीय चरित्रावली में लगे दागों को छुपाया गया। आज स्थिति यह है कि जिला प्रशासन की बनाई जांच टीम महीनों से जांच पेंडिंग रखे हुए है, और इस मामले में संलिप्त कर्मचारी अस्पताल के महत्वपूर्ण प्रभाग के ‘माई-बाप’ बनकर खुद अपनी ही जांच फाइलों और सबूतों पर कुंडली मारकर बैठें हैं।
तत्कालीन सिविल सर्जन से लेकर ट्रेजरी अफसर तक का सिंडिकेट बेनकाब, पर एक्शन ‘शून्य’
दस्तावेजों के संपूर्ण विश्लेषण से साफ है कि यह घोटाला किसी एक अदने बाबू के बूते का नहीं था, बल्कि इसमें ऊपर से लेकर नीचे तक पूरा एक संगठित सिंडिकेट काम कर रहा था:
तत्कालीन सिविल सर्जन सह अस्पताल अधीक्षक: मुख्य आहरण एवं संवितरण अधिकारी (DDO) होने के नाते वित्तीय सीमाओं का उल्लंघन कर बिल पास करने की अंतिम जिम्मेदारी इनकी है। घोटाला उजागर होने के बाद भी दागी को बचाने के लिए नियम विरुद्ध ‘संशोधित आदेश’ जारी करना इनकी सीधी संलिप्तता दर्शाता है।
जिला कोषालय अधिकारी और स्टाफ: वित्तीय अनियमितता के इस गंदे खेल को आखिर ट्रेजरी ने क्यों नहीं पकड़ा? बिना वैध कागजातों के सरकारी खजाने से लगभग 30 लाख रुपये का भुगतान जारी करना कोषालय को सीधे कटघरे में खड़ा करता है।
इतने पुख्ता कड़ियों के बावजूद, कलेक्ट्रेट से लेकर राजधानी रायपुर के स्वास्थ्य संचालनालय तक फैले इस महा-मौन ने साबित कर दिया है कि रक्षक ही भक्षकों के सबसे मजबूत ढाल बने बैठे हैं।
मूक प्रशासन नए घोटालों को दे रहा है खुली दावत
राजनांदगांव जिला प्रशासन की यह अंतहीन निष्क्रियता चीख-चीख कर कह रही है कि यहाँ ‘कानून का राज’ पूरी तरह दफन हो चुका है और उसकी जगह ‘लूटतंत्र’ हावी है। जब खुली अनियमितताओं, फर्जी प्रभारों और नियम विरुद्ध प्रमोशनों पर भी प्रशासन का हथौड़ा नहीं चलता, तो यह ईमानदार कर्मचारियों के मनोबल पर करारा तमाचा है। शासन की यह रहस्यमयी चुप्पी आने वाले दिनों में और बड़े घोटालों का रास्ता साफ कर रही है, जिसका खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ रहा है।
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