मनरेगा भुगतान में बड़ा खेल, शिकायत के 14 दिन बाद भी शांत जिला प्रशासन — सहसपुर लोहारा में भुगतान घोटाले पर संरक्षण के आरोप तेज
कवर्धा Xreporter News। जिले के जनपद पंचायत सहसपुर लोहारा में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के भुगतान को लेकर गंभीर अनियमितताओं और पक्षपात के आरोप सामने आए हैं। मामले ने अब प्रशासनिक निष्क्रियता और संभावित मिलीभगत पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 18 जून 2026 को इस पूरे मामले की लिखित शिकायत जिला पंचायत कबीरधाम के मुख्य कार्यपालन अधिकारी को सौंप दी गई थी, लेकिन आज दिनांक तक शिकायत पर किसी भी प्रकार की ठोस जांच, कार्रवाई या जवाबदेही तय नहीं की गई। ऐसी स्थिति में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जिला प्रशासन किसे बचाने में लगा है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सहसपुर लोहारा जनपद पंचायत में मनरेगा अंतर्गत भुगतान प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शिता से दूर होकर मनमानी और पक्षपातपूर्ण तरीके से संचालित की जा रही है। आरोपों के केंद्र में प्रभारी कार्यक्रम अधिकारी दिलीप साहू (सहायक प्रोग्रामर) का नाम सामने आया है, जिन पर भुगतान प्रक्रिया में मनमाने हस्तक्षेप और प्राथमिकता तय करने के गंभीर आरोप लगे हैं।
जानकारी के अनुसार वर्ष 2025-2026 से लंबित हितग्राही मूलक कार्य, जिनमें कुआं निर्माण, पशु शेड निर्माण तथा अन्य व्यक्तिगत लाभकारी कार्य शामिल हैं, आज तक भुगतान की प्रतीक्षा में पड़े हुए हैं। ये वे कार्य हैं जिनसे सीधे गरीब ग्रामीण परिवारों को राहत मिलनी थी। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इन लंबित कार्यों को दरकिनार कर वर्ष 2026-2027 में पूर्ण हुए कार्यों का भुगतान प्राथमिकता के आधार पर किया गया।
शिकायत में विशेष रूप से उल्लेख है कि 03 जून 2026 को केवल 22 कार्यों के एफटीओ (फंड ट्रांसफर ऑर्डर) का भुगतान किया गया। इन कार्यों में मुख्य रूप से चेक डैम, स्टॉप डैम और रिटेनिंग वॉल जैसे निर्माण कार्य शामिल थे। आरोप है कि इन कार्यों को चुनिंदा तरीके से भुगतान के लिए आगे बढ़ाया गया, जबकि गरीब हितग्राहियों से जुड़े पुराने और वास्तविक जरूरत वाले कार्यों को जानबूझकर लंबित रखा गया।
यह स्थिति केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि मनरेगा जैसी जनकल्याणकारी योजना की मूल भावना पर सीधा प्रहार मानी जा रही है। मनरेगा अधिनियम 2005 का स्पष्ट उद्देश्य ग्रामीण गरीबों को रोजगार और समयबद्ध भुगतान उपलब्ध कराना है। भुगतान में भेदभाव, चयनात्मक प्राथमिकता और देरी न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा के भी विपरीत है।
सबसे गंभीर पहलू जिला प्रशासन की चुप्पी है। शिकायत मिलने के बाद सामान्यतः प्रारंभिक जांच, दस्तावेज सत्यापन और जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब तलब की प्रक्रिया शुरू हो जानी चाहिए थी। लेकिन 18 जून 2026 से आज तक कोई कार्रवाई न होना कई गंभीर संकेत देता है। इससे संदेह और गहरा हो जाता है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक स्तर पर मामले को दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि यदि शिकायत में लगाए गए आरोप निराधार होते तो प्रशासन तत्काल जांच कर शिकायत को खारिज कर सकता था। लेकिन जांच ही न होना प्रशासन की नीयत पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है। आखिर भुगतान सूची में किन आधारों पर कार्य चुने गए। 2025-2026 के लंबित हितग्राही कार्यों को क्यों रोका गया। किनके दबाव में 2026-2027 के कार्यों को प्राथमिकता मिली। इन सभी सवालों का जवाब अब तक प्रशासन नहीं दे पाया है।
यदि शिकायत में वर्णित तथ्य सही हैं, तो यह केवल भुगतान अनियमितता नहीं बल्कि गरीबों के हक पर डाका है। जिन मजदूरों और हितग्राहियों ने काम पूरा कर लिया, उन्हें समय पर भुगतान नहीं मिलना सीधे आर्थिक शोषण की श्रेणी में आता है। ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा की मजदूरी ही कई परिवारों की जीवनरेखा होती है। भुगतान रोककर उन्हें आर्थिक संकट में धकेलना बेहद गंभीर मामला है।
18 जून 2026 को की गई लिखित शिकायत के बावजूद आज दिनांक तक किसी प्रकार की कार्यवाही नहीं किया जाना कहीं न कहीं जिला प्रशासन की मिलीभगत अथवा संरक्षण की संलिप्तता को दर्शाता है। क्योंकि यदि प्रशासन निष्पक्ष होता तो अब तक जांच रिपोर्ट सामने आ चुकी होती और दोषियों पर कार्रवाई हो चुकी होती।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या जिला प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाएगा, या फिर फाइलों में शिकायत दबाकर जिम्मेदारों को बचाने का काम जारी रहेगा। सहसपुर लोहारा का यह मामला अब केवल भुगतान अनियमितता तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्ट तंत्र की परीक्षा बन चुका है। जनता की नजरें अब जिला प्रशासन पर टिकी हैं।


